‘साइलेंस ऑफ़ द लेफ़्ट’, टाइप= कन्विनिएंट

सर? उ जेएनयू वाला काँड सुने क्या?

अब कौन सा काँड हो गया बे? फिर कोई एमएमएस आया क्या? या फिर किसी ने सेक्सुअल ऑफेंस कर दिया? जेएनयू तो प्रोटेस्ट के साथ साथ भारत के तमाम विश्वविद्यालयों को ‘सेक्स, रेप और ‘फन टाइम” वाले आस्पेक्ट में पछाड़े हुए है।

अरे नहीं सर, वो सब तो होता ही रहता है। अरे अफ़ज़ल गुरू की बरसी मना रहे थे। ‘भारत की बर्बादी’, और ‘हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा’ आदि आदि कह रहे थे। आप टीवी नहीं देखते क्या? ऐट लिस्ट, फेसबुक पर तो देखा होगा। वैसे आपने ये कैसे क्लेम किया कि सबसे आगे है जेएनयू ‘काँड-वाँड’ करने में? कोई डेटा है आपके पास?

डेटा? काहे का डेटा दें बे? बाईस साल के ट्रायल के बाद जब फाँसी लगा याकूब को तो उसको इन्होंने ख़ारिज कर दिया कि चार जज मिलकर किसी की जिंदगी पर फैसला कैसे दे सकते हैं…

हें हें हें… सर इस बार भी अफजलवा के बरसी पर वही लॉजिक दे रहे हैं…

हमको पता है इनका सारा लॉजिक। जज सब चूतिए हैं, और असली ब्रह्मज्ञान और जीवन का सारतत्व तो गंगा ढाबा पर गाँजा, बीड़ी आदि पी कर ही मिलता है। इसीलिए हमने डेटा-वेटा देना बंद कर दिया है। कुछ दिन में हम लॉजिक देना भी बंद कर देंगे जेएनयू वालों को?

वो काहे सर? बिना लॉजिक का बात कैसे होगा?

अबे सुनो, हम हैं ब्राह्मण तो हो गए राइट विंगर फ़ासिस्ट, पढ़ें है मिलिट्री स्कूल में जहाँ से आगे जाते तो रेपिस्ट बनते इन्डियन आर्मी के, बाद बाकी कसर डीयू में पढ़कर पूरी कर लिए तो हमारा लॉजिक तो वैसे भी कोई लॉजिक नहीं है!

सर पोस्टर देखे आप? उस पर लिखा था कल्चरल इवनिंग पर आइए और वहाँ पर आर्टिस्ट, पोएट, सिंगर, इंटेलेक्चुअल, एक्टिविस्ट सब आएँगे… और बताइए कह रहे थे ‘भारत की बर्बादी तक’ पता नहीं क्या क्या करते रहेंगे, हमको समझ में नहीं आता है ज्यादा!

देखो जब आदमी फ़र्ज़ी हो जाता है और उसकी अपनी कोई आइडेंटिटी नहीं होती सिवाय इसके कि वो जेएनयू में है और प्रोटेस्ट करता है तो वो अपने नाम में इंटेलेक्चुअल, एक्टिविस्ट आदि का विशेषण लगाने लगता है। शब्द तो अच्छे हैं लेकिन जेएनयू वालों ने उसकी कह के ले ली है। जो सही में एक्टिविजम कर रहे हैं या इन्टेलेक्चुअल हैं वो कभी नहीं कहते कि वो एक्टिविस्ट, इंटेलेक्चुअल हैं।

ये तो सही कहते हैं! अच्छा, पता है हाफ़िज़ सईद बोला है कि जेएनयू में उसके पाकिस्तान-समर्थक भाइयों को उसका पूरा सपोर्ट रहेगा। बताइए कहाँ की बात कहाँ चली गई। साला हफ़ीज़ सईद भी जेएनयू में भाई बना रहा है! औ उ कड़वा-भड़वा तो आप सुने ही थे…

बिलकुल सुने थे। ये सब जो है वो ‘वाॅयलेंस ऑफ़ द लेफ़्ट’ है। इनकी दुकानदारी बंद हो गई है। अब इनकी फ़्रेंचाइज़ी कहीं कोई खोलने को तैयार नहीं तो ये हर वो काम करेंगे जो इन्हें इनके आकाओं द्वारा कहलाया जाएगा। विरोध करना है कैपिटल पनिशमेंट का, बना देंगे हीरो याकूब को… साला कसाब जैसा लौंडा इतने लोग मार देता है और वो हो जाता है ‘मिसगाइडेड यूथ’… पाकिस्तानियों को भाई मानते हैं और हिन्दुस्तानियों के टैक्स के पैसे पर ‘पलते’ हैं।

सर, वो ‘पलते’ को आपने सिंगल इन्वर्टेड कोमा में काहे लिखा? कॉन्डासेंडिंग वे में इस्तेमाल कर रहे हैं क्या! खीं खीं खीं, समझ गए। वॉयलेंस आफ़ द लेफ़्ट तो सही में है सर। क्या स्तर रह गई राजनीति की? इसीलिए कहते हैं बाबू हमारे कि पढ़ने गए हो, पढ़ाई करो, फुटानी मत छाँटो। विद्यार्थी राजनीति करता ही क्यों है, मेरे ख्याल से राजनीति शास्त्र का अलग विद्यालय होना चाहिए।

ऐसे विद्यालयों में पढ़ाएगा कौन? वैसे जेएनयू वैसा विद्यालय नहीं, विश्वविद्यालय है। पढ़ाई तुम कुछ भी करो, करते तो राजनीति ही हो।

कैसी राजनीति सर?

दादरी पर बवाल, मालदा पर साइलेंस; अखलाख पर बवाल, पुजारी पर साइलेंट; वेमुला पर बवाल, केरल की तीन लड़कियों की ख़ुदकुशी पर साइलेंट; मुस्लिम टेकी की मौत पर बवाल, हिंदू लौंडे को एसिड से जला देने पर साइलेंट; इशरत जहाँ पर जबतक सबूत नहीं थे खूब बवाल, आज हेडली का बयान आया तो साइलेंट… जानते हो इसको क्या कहते हैं?

नहीं सर।

इसको कहते हैं ‘साइलेंस ऑफ़ द लेफ़्ट’, वो भी कन्विनिएंट टाइप का। इसमें कूल डूड वाला लिंगो में ‘सच कन्विनिएँस, मच वॉव’ हो जाता है! खीं खीं खीं…

खीं खीं खीं

Advertisements

Did you like the post, how about giving your views...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s