मैं एक टुटपुँजिया विचारक हूँ

मैं एक टुटपुँजिया विचारक हूँ। ये मैं जानता हूँ और भलीभाँति समझता हूँ। जिन्हें पता नहीं कि टुटपुँजिया क्या है तो उनको बता दूँ कि टुटपुँजिया फ़र्ज़ी से थोड़ा ही ऊपर है, बाकी इनके विचारों का भी कोई औचित्य नहीं होता। मैं ये जानता हूँ कि मेरे या मेरे जैसों विचारकों के विचार का कोई मतलब ना था, ना है और ना ही रहेगा।

फेसबुक पर एक खेमा सँभाल लेना सबसे आसान है। उससे भी आसान है किसी को भक्त कहना, किसी को संघी, किसी को काम-रेड, किसी को आपटार्ड, किसी को शेखुलर (ये नया पढ़ा है मैने) या किसी को खान्ग्रेसी। ये कहने में और उसे दिल में बिठा लेने में ज्यादा से ज्यादा टाइप करने भर का समय लगता है।

आजकल जेएनयू, वेमुला, सियाचिन आदि पर लिखना वोग में है।

लिखने तक ठीक है लेकिन फैसला सुनना बंद कीजिए। आपको याद होना चाहिए की आप कोई नहीं हैं। आप ना तो किसी को देशभक्ति को सर्टिफिकेट दो सकते हैं ना ही देशद्रोही होने का। कुत्ते को ढेला मार कर खाली लोय-लोय करने से बचिए।

मेरे जैसे एक टुटपुँजिया विचारक को हमेशा ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हमें अपनी बात कहने का हक है, दूसरे को गरियाने का नहीं। क्योंकि आपकी गाली से उसका होना जाना कुछ नहीं है, बाकी दूसरे आप पर फैसला सुनाने लगेंगे सो अलग।

टुटपुँजिया होने और इसका रियलाइजेशन कर लेना सबसे सही बात है। इससे फ़ायदा ये होता है कि मैं गोडसे और अफ़ज़ल दोनों को समान रूप से गरिया सकता हूँ। जहाँ आप संघ के राष्ट्रवाद या वामपंथी लोकतंत्र के गुणगान में लगे कि आप टुटपुँजिया से महान विचारक और बुद्धिजीवी की श्रेणी मे तत्क्षण पहुँच जाते हैं।

महान होने के अपने फ़ायदे ज़रूर हैं, पर कई बार टुटपुँजिया बने रहना ज्यादा सही है। यहाँ फ्लेक्सिबिलिटी है। यहाँ पर महान विचारक होने का दवाब नहीं है कि मन कुनमुना रहा है कि गोडसे की पूजा करने वाले को कैसे गरियाएँ, और ना ही नियो-कम्यूनिज्म के महान विचारक होने का दवाब है कि ‘भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी’ वालों को आड़े हाथ लिया जाय।

टुटपुँजिया विचारक को जस्टफिकेशन नहीं देना होता। महान विचारक होने जाने पर ये दिक्कत है कि आपको गोडसे वाली बात भी जस्टिफाय करनी पड़ेगी जबकि आप जानते हैं कि गाँधी पूजा और गोडसे पूजा दोनो करना कितना बड़ा चूतियाप है। फिर आपको ‘भारत के सौ टुकड़े’ करने वालों को भी ‘इनोसेंट स्टूडेंट’ कहना पड़ेगा।

महान विचारकों को बड़े कवियों की कविता ढूँढनी पड़ती है। महान विचारक दूसरों के लिखे ट्वीट दिखाकर जस्टीफाय करता है। महान विचारक की ख़ासियत ही यही है कि वो तमाम बातें दूसरों के कहे होने के कारण सही मानता है। टुटपुँजिया विचारक उतना टेंशन नहीं लेता, वो बस जो ठीक लगता है कह देता है। किसी ने कहा कि गलत है तो तर्क-वितर्क के बाद गलती मान लेता है।

मुझे ही लीजिए, मैं मान कर चलता हूँ कि मुझे ना तो पॉलिटिक्स की समझ है, ना मैं संघ के बारे में जानता हूँ, ना मैंने कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो पढ़ा है, ना ही भारत का संविधान मुझे कंठस्थ है। मेरी सारी सोच का श्रोत मेरी थोड़ी बहुत पढ़ाई लिखाई है, और चार लोगों से बातचीत के बाद अपनी बुद्धि का उपयोग तक सीमित है।

मेरे लिए कुछ चीजें समझौता करने के लिए नहीं है। उसमें से एक है भारतीय सेनाएँ और दूसरा है भारत देश।

यहाँ पर मेरी टुटपुँजिया फ्लेक्सिबिलिटी थोड़ी कम है, या यूँ कहिए कि बंद है। सरकार कोई भी रहे, लेकिन भारत की बर्बादी का नारा लगाने वाले लड़के अगर नाबालिग़ हैं, तो उस हिसाब से, और वालिग हैं तो उस हिसाब से इन्टेंट का निर्धारण करके भारतीय दंड विधान के हिसाब से लपेटे जाने चाहिए। बिल्कुल उसी तरह चाहे वो पाँच साल का बच्चा हो या फिर पच्चीस साल का नवयुवक, अगर वो गणतंत्र दिवस को काला दिन मान रहा हो तो उसकी चूतड़ें भी माक़ूल तरीके से सेंकी जानी चाहिए। अच्छा, चलिए पाँच साल वाले को समझा देना चाहिए कि झंडा जलाना गलत है, लेकिन उसे ये याद रहे इसके लिए उसके हाथ से लड्डू ज़रूर छीन लेना चाहिए।

हो सकता है मेरी कोई बात आपको तर्कसंगत ना लगी हो। भाई टुटपुँजिया आदमी से क्या तर्क की बात करते हो। हमें जो लगता है, हम कहते हैं। हम जानते हैं कि कोई फ़र्क़ नहीं पड़नेवाला फिर भी कहते हैं, क्योंकि नहीं कहना, गलत कहने से ज्यादा ख़तरनाक है। गलत कहिएगा तो चार गाली सुनके सुधरिएगा, नहीं कहिएगा तो फिर सही हैं या गलत ये भी पता नहीं रहेगा।

महान विचारकों (या वैसा बनने की चाह रखने वालों) से अनुरोध है कि मुझे संघी या भक्त समझकर पसंद कर रहे हों तो अन्फ्रेंड कर लें, मुझे बुरा नहीं लगेगा। मैं एक ही दिन के पोस्ट में आपको भक्त, वामपंथी और कट्टर राष्ट्रवादी तीनों लग सकता हूँ। एक ही दिन में तीनों होने में कोई बुराई नहीं है। सबको अपनी बात कहने का हक है। आप ये मत ढूँढिए, “हैं! ये मेरे मन की बात क्यों नहीं कह रहा!”

किसी एक विचारधारा के होने में बहुत दिक़्क़तें हैं। कोई भी एक विचारधारा बहुत ज्यादा दिन तक नहीं चलती, आदमी चलता रहता है। आदमी बनिए वरना ब्रा खोल कर निप्पल प्रदर्शन करने वाले नारीवादी विचारक भी हैं और चड्डी पहनकर घूमने वाले राष्ट्रभक्त भी। और आपको अच्छे से पता है कि दोनों ही अलग अलग श्रेणी के चूतियाप हैं।

बाकी, आपका अपना दिमाग है ही। टुटपुँजिया लोगों को ये बात तुरंत समझ में आ जाएगी, महान विचारकों और स्वघोषित बुद्धिजीवियों को इसे नीचे उतारने में दिक्कत होगी कि ये क्या बात हुई एक ही आदमी लेफ़्ट-सेंटर-राइट तीनों का कैसे हो सकता है।

हम हैं, हम हैं टुटपुँजिया और बहुत गर्व है अपने इस बेपेंदी के लोटे होने पर। ज़हरीले पानी का लोटा होने से बढिया है साला पेंदी ना हो।

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