‘ज्वलंत’ मुद्दों के बीच मैं पार्टी बदल कर तटस्थ हो गया हूँ

वैसे तो समय तटस्थ रहने वालों का भी अपराध लिखेगा, दिनकर ने कहा है, पर कई मौक़ों पर जब समझ में ना आए तो खेमा पकड़ने से बेहतर है तटस्थ रह जाना। 

जेएनयू और एन्टी-नेशनल काँड पर मैं अपने इग्नरेन्स के साथ तटस्थता की तरफ बढ़ रहा हूँ। आज पता चला वीडियो डॉक्टर्ड हैं! साला आदमी को डॉक्टर नहीं मिलता यहाँ इस देश में और वीडियो का ऑपरेशन हो रहा है! 

ख़ैर कल को कोई ये ना कह दे कि जेएनयू ही पूरा डॉक्टर्ड है! आदमी के बँटने के बाद, पत्रकारों को ‘खुलकर’ बँटना था, जिन्हें अक्सर एथिक्स वाले चैप्टर में ‘ऑब्जेक्टिव’ एनालिसिस करने वाला कहा जाता है। 

कोई बोलकर टीवी फोड़ रहा है, तो किसी को टीवी पर अँधेरा दिखाकर इमरजेन्सी के दौर का इंडियन एक्सप्रेस बनने की चाह है। कोई एन्टीनेशनल होने को गुण मान रहा है तो कोई केरल की आजादी, भारत की बर्बादी को ‘डिसेन्ट’ कह रहा है।

न्यूज़ देखा नहीं कुछ दिनों से, सोशल मीडिया भी लिमिटेड देख रहा हूँ। माथा साला खराब हो गया है कि हर उस समय में जब हम एक इशू के लिए झंडा या डंडा उठाकर दौड़ने लगते हैं तो ये कन्विनिएंटली भूल जाते हैं कि दाल का क्या भाव है, और किसानों की आत्महत्या, पाँच-दस लाख लोगों के बौद्धिक मैथुन से ज्यादा जरूरी बातें हैं।

तुम्हें क्राँति करनी है? क्राँति विशुद्ध वैचारिक स्तर पर नहीं हो सकती, ये बस फेसबुक और मीडिया के कक्षों में ही होगी। इससे एक पैसा बदलाव नहीं आएगा। कल भारत-पाकिस्तान का मैच होगा और आइपीएल आएगा, और तुम्हारी क्राँति का शीघ्रपतन हो जाएगा। तुम्हारे किसी पक्ष में, किसी खेमें में होने से किसी को भी फ़र्क़ नहीं पड़ता।

भारत की जनसंख्या तो मालूम ही होगी। उसके पास क्या दिक़्क़तें हैं ये भी मालूम होगी। भेड़चाल मालूम ही होगा तुम्हें, भेड़ियों की पहचान भी होगी तुम्हारे पास। समाज में विचारों की ज़रूरत है लेकिन ये विचार तुम्हें कहाँ ले जा रहे हैं? ये विचार तुम्हारे मुद्दे को कहाँ ले जा रहे हैं? 

इस मुद्दे का अंत एक नया मुद्दे का आगमन ना बन जाए, इसलिए बहिए मत, ठहरिए। क्योंकि यही होता आया है। आप नहीं ठहरेंगे तो ये मुद्दों का झुनझुना बजता रहेगा। 

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