कन्हैया जी, JNU देश नहीं है, न ही देश का प्रतिबिम्ब है

भारत के नए जवाहरलाल का स्वागत है। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जुमलों के खिलाफ बोलने के लिए  खुद जुमलों का सहारा ले रहे हैं। लेकिन ठीक है कि कम से कम इनकी आज़ादी अब भारत से नहीं, भारत में ही चाहिए। इनका कहना है की 31% ने ही इस सरकार को वोट दिया, बाकि इनके ओप्पोजिशन में थे। सीरियसली? आपका राजनीतिक ज्ञान अब यहाँ तक सिमट गया है की अपनी बात को साबित करने के लिए कुछ भी बोलियेगा और “बहुत बड़ा आंदोलन” करने वाले ढाई हज़ार लोग उन्माद में “हो हो” करते रहेंगे!

याद है पिछली सरकार को कितने लोगों ने वोट नहीं किया था? आप जिस विचारधारा से ताल्लुक़ रखते हैं उनके ख़िलाफ़ कितना वोट जाता है पता है आपको? मैं बताता हूँ पंचानवे प्रतिशत से ऊपर। लेकिन आपको लगता है कि पूरा देश आपके साथ है। माफ़ कीजियेगा मुझे आज तक ऐसा नहीं लगता। JNU देश नहीं है, न ही देश का प्रतिबिम्ब है। अगर ऐसा होता तो आपकी पार्टी सरकारें चला रही होतीं।

फिलहाल ऐसा नहीं है। आपकी बात में राजनीति भी नहीं है। आपकी बात में घृणा है। और ये घृणा भी राजनैतिक या वैचारिक नहीं, एकदम वैयक्तिक है। आप न तो पहले कन्हैया हैं, न ही आख़िरी होंगे। आप जैसे लोगों का राष्ट्रीय राजनीति में होना ज़रूरी होता है। लोगों को पता चलता रहना चाहिए की देश के ‘कुछ युवा’ क्या सोचते हैं।

कन्हैया जी काम तो हो रहा है देश में। मुझे तो दिख रहा है। पावर, विदेश नीति, इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा, रेल आदि में काम तो हो रहा है। हाँ, अगर आपको एक-दो साल में पिछले साठ साल से ज्यादा तरक्की चाहिए तो फिर मैं माफ़ी मांग लेता हूँ। क्योंकि मेरे हाथ में न तो माइक है न ही 2500 लोगों की भीड़, न ही मैंने JNU में पढाई की है। मैं नेता नहीं हूँ कन्हैया। हो सकता है आज से चालीस साल बाद तुम एक सांसद बनकर आओगे। फिर अपने इस ‘ओन द स्ट्रोक ऑफ़ मिडनाइट’ वाला भाषण सुनना, बड़ा लुत्फ़ आएगा।

अच्छा लगा ये सुनकर कि आपको देश की चिंता है। हमें भी है, सबको है। होना भी चाहिए। हाँ आंकड़ों से खेलने में थोड़ा पिछड़ जाऊंगा। और सम्भाषण की कला में उतना निपुण नहीं हूँ।

मुझे तो अच्छा लगता है जब कोई प्रधानमंत्री को हिटलर, मुसोलिनी, साइकोपाथ, हरामख़ोर आदि कहता है। मेरा प्रजातंत्र में विश्वास और भी प्रबल हो जाता है।

आपको हाइकोर्ट का वर्डिक्ट भी मिला होगा। या शायद ऑब्जरवेशन जो जज साहब ने दिया था। मानिये या मत मानिये, देश का नमक खाते हैं तो उसको तोड़ने की चेष्टा मत कीजिये। आपको सियाचिन के सैनिकों की चिंता सिर्फ इसलिए नहीं की किसी नेता का बेटा या भाई वहां नहीं है! सीरियसली? अगर किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो हमे सैनिकों का अपमान करते रहना चाहिए? ये कौन सा कुतर्क है? ऐसा नहीं है की सरकार के पास चिंता करने के लिए एक ही बात होनी चाहिए की या तो किसान या फिर सैनिक। मतलब, जब तक किसान आत्महत्या करते रहेंगे तबतक संसद पर बम गिराने वालों को अशोक चक्र मिलते रहना चाहिए!

ये “हो हो”, “शेम शेम” चलता रहेगा। JNU में ये चलता रहता है, JNU में ये चलता रहना चाहिए क्योंकि JNU को JNU यही अदा तो बनती है। जिस “विशाल आंदोलन” की बात कर रहे हो कन्हैया, उसमे तुम्हारे ही कुतर्क का प्रयोग करते हुए ये कहना चाहूंगा कि देश के 130 करोड़ लोग तुम्हारे साथ नहीं है। या यूँ कहूँ की जिस तरह से मोदी के विपक्ष में 69% लोग हैं, उसी ‘बेनिफिट ऑफ़ डाउट’ के हिसाब से 99.99% से भी ज्यादा लोग तुम्हारे साथ नहीं हैं। वैसे सबको पता है कि किसानों और ग़रीबों की चिंता तुम्हें कितनी है और कब तक रहेगी।

लेकिन मैं तुम्हारा सम्मान करता हूँ कन्हैया कि तुम में बोलकर जेल जाने की हिम्मत तो है। कम से कम तुम्हारा आंदोलन आज के युवा की तरह, मेरी तरह, फेसबुक के पोस्ट और कमेंट तक तो सीमित नहीं। तुम जेल में रहकर तो आये, तुम बोल तो रहे हो। हाँ ये याद रखना, जैसा कि हाइकोर्ट ने कहा कि तुम्हारी बातों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं रखा जा सकता। इसका ख्याल भी रखना और देश के संविधान का मान भी। बाकि तुम्हारी विचारधारा की पार्टियों ने देश का कितना भला किया है वो हर उस जगह दिख रहा है। तुम न तो देश हो, न ही देश आवाज़। तुम कन्हैया हो, जो कि बहुत ही प्रचलित नाम है। इसके इतर कुछ भी नहीं।

लाल सलाम
अल्लाहु अकबर
जय श्री राम

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