भाषणों, प्रतिक्रियाओं और सुपरलेटिव विशेषणों के दौर में आलोचना का शीघ्रपतन

आजकल सब स्पीच दे रहे हैं। लोकसभा में दे रहे हैं, कहवाघरों में दे रहे हैं, ऑफिस में दे रहे हैं और सबसे ज्यादा प्रजातांत्रिक देश ‘इंडिपेंडेंट रिपब्लिक ऑफ़ फ़ेसबुक’ में भी स्पीच लिखा जा रहा है। हम सबसे अंतिम वाले में आते हैं।

“पचाँस हजार चाइये कि साँठ हजार… विकाँस…”, “मैंने रोहित वेमुला की माँ से बात की थी…”, “ये संघी हमें बताएँगे?”, “शेऽऽऽऽम… शेऽऽऽऽम…”, “मेक इन इंडिया का बब्बर शेर… उसमें घड़ी जैसा कुछ चलता रहता है…”, “मैंने पूछा डंडा चलाने का पावर किसके पास है?”, “हा हा हा हा… हो हो हो हो…”

आपके पास स्मार्टफ़ोन तो है ही, आप भी स्मार्ट हैं। सब स्मार्ट युवक (और युवतियाँ भी) अपना अपना खूँटा पकड़ लिए हैं और खुद को बाँध लिया है, फिर उसी में गोल-गोल घूमना है।

हाँ तो स्पीच… भाषण को हमेशा से हमारे समाज में ‘हवाबाजी’ के रूप में देखा गया है। घर पर कुछ बोलिए तो बाप बोलेंगे, “दोगे ज्यादा भाषण? चार पैसा कमाओगे तब बोलना।” मतलब ये है कि भाषण देने वाले में वज़न ना हो तो वो हवाबाज़ी हो जाती है।

भाषणों के इस दौर में मैंने भी कई दिए हैं फेसबुक पर। मेन बात ये है कि किसका भाषण बढिया है, या किसका घटिया नहीं है। ये बात गौर करने वाली है। एक मिनट, सीन से बाहर आइए। ज़ूम आऊट कीजिए। वहाँ, उस खूँटे से दूर आइए।

अब देखिए, और अब सुनिए। कन्हैया से लेकर मोदी, राहुल, केजरीवाल, ईरानी सब एक ही हैं। ये सब आवाज़ें हैं, जिनका किसी से कुछ लेना देना नहीं है। ये सारे खूँटेबाजों के लिए मेंटल स्टिमुलेशन का वायग्रा है। वायग्रा से लिंग में स्तंम्भन आता है, इन स्पीचों से आपके दिमाग में उन्माद फैलता है। पाँच मिनट बाद ना तो वायग्रा की याद रहती है ना कन्हैया के भाषण की।

कन्हैया का पुराना भाषण अब कोई याद नहीं कर रहा। मोदी का पंद्रह लाख वाला भाषण गायब है। रोहित वेमुला मर गया और उसकी राख हम तुम तब तक उड़ाएँगें जब तक कुछ लोगों की स्वार्थ सिद्धी होती रहेगी। रोहित के मरने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं, दलित रोहित के मरने पर है। जवान शहीद हो रहे हैं बोलिए तो किसान की आत्महत्या की याद दिलाई जाएगी। बोलिए सड़क बन रहे हैं तो कहेंगे शिक्षा का बजट कम है। बोलिए बिजली आ रही है तो कहेंगे सेसेंक्स नीचे जा रहा है।

ग़ौरतलब ये है कि यो सारा काम पिछले अठारह महीनों में हुआ है।

अच्छा लगता है जब क्यूट पपीज़ और डकफेस स्माईली वाले सेल्फीकाल से निकल कर देश का युवा अपना अपना खूँटा पकड़ रहा है। अच्छा लगता है जब फेसबुक अपने करियर का पीछा करते हुए बाल गँवा चुके नवयुवकों के चाय के दुकान पर हो रही परिचर्चाओं को मेनस्ट्रीम में लाने का ज़रिया बनता है।

स्पीच देते रहना चाहिए, लिखते रहना चाहिए। हाँ, तौलना सीखिए। ‘विवेक का इस्तेमाल करो, मेज़र!’ आजकल अजीब सा दौर चला है, पहले हमारे टीचर हमारी कॉपियों पर अच्छे उत्तर देने पर ‘गुड’ लिखते थे; फिर वो ‘वेरी गुड’ लिखने लगे। फिर कुछ नए लोग आए तो कॉपी पर ‘सुपर्ब’ भी लिखा जाने लगा।

पहले फ़िल्में ‘हिट’ होती थीं, फिर ‘सुपरहिट’ होने लगीं, फिर चैन ना मिला या ‘सुपरहिट’ टू मेनस्ट्रीम हो गया तो ‘सुपर डुपर हिट’ होने लगा। आजकल लोग नए विशेषण तलाश रहे हैं।

स्पीच होती नहीं कि हम गँड़खुल्ला टाइप सबसे पहले लिखने के चक्कर में इतने प्रभावित दिखने लगते हैं कि मानों नारायण के श्रीमुख से गीता सुन लिया हो। मैं किसी स्पीच के बारे में नहीं लिखूँगा यहाँ पर। आपसे खाली विनती है कि जिस जिस स्पीच पर आपने वायग्रा चबाया था, उस उस स्पीच को वो सारे लोग दोबारा अपने वैचारिक उन्मादास्खलन के बाद फिर से देखें और समझकर बताएँ कि आपने जो रायता फैलाया है, कहाँ तक उचित है।

यहाँ तो भूकंप आता है तो लोग भागते नहीं, “वॉज़ इट एन अर्थक्वेक?” ट्वीट करते हैं। इस तरह के युवावर्ग से छिछला विवेचन ही मिलेगा। मीडिया का भी वही हाल है। सबसे पहले रिएक्शन देना है, फिर विवेचना-आलोचना का समय कहाँ है।

आजकल त्वरित प्रतिक्रियाओं का दौर चल रहा है जहाँ हर विशेषण सुपरलेटिव से कम नहीं होना चाहिए। आप या तो एकदम फ़ैन हो जाते हैं, या नकार देते हैं। दोनो ही स्थिति में आदमी अक्सर वजहें लिखना भूल जाता है।

आप अभी अपने टाइमलाइन पर पचास स्टेटस देखिए और ये भी देखिए कि किस किस ने कन्हैया के स्पीच को अच्छा या बुरा कहा और साथ ही में स्पीच के किसी भी हिस्से को अपने तर्क के साथ अच्छा या बुरा बतलाया हो।

ये डेटा देखिए, फिर खुद को देखिए।

अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम
अल्लाहु अकबर सीताराम, जय श्री राम को लाल सलाम

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