फ़ॉग ही चलता रहा तो लफंदरई ही होगी, आलोचना नहीं

देश में फेसबुक चल रहा है। फेसबुक को आज का युवा और कल के कुछ बुज़ुर्ग चला रहे हैं। बुज़ुर्गों को युवा चला रहा उनकी बातें शेयर और लाइक करके। और युवा को चला रहा है फ़ॉग। फ़ॉग कई तरह का होता है, एक होता है वो जो इतना चलता है कि दिखना बंद हो जाता है। एक दूसरा टाइप का फ़ॉग दिमाग तक पहुँचता है तो उससे आदमी के देखने की क्षमता खतुम हो जाती है।

दोनों अलग तरह के फ़ॉग हैं। पहले में आपके इग्नरेन्स का रोल ज्यादा है, दूसरे में आप फ़ॉग को नाक से इतना सूँघ लेते हैं कि आप के सामने सारी चीजें होती हैं फिर भी आप देख नहीं पाते। ये वाला फ़ॉग फेसबुकिया नागरिकों और विचारकों में ज्यादा पाया जा रहा है। हमने कुल तीन लोगों पर स्टडी करके देखा है।

सिर्फ देखने की शक्ति नहीं गई है, सोचने की भी चली गई है साथ में। सब चीज इन्स्टा-कॉफी टाइप हो गया है। ये फ़ॉग भी इन्स्टैंट ही तो है। हमारे विचार भी एकदम इन्स्टैंटली निकलते हैं। लेकिन विचार इन्स्टैंटली नहीं निकल सकते, इन्स्टैंटली रिएक्शन निकलता है। विचार के लिए समय चाहिए और समय हमारे युवा के पास लगता तो नहीं है कि है।

इसमें क्या होता है कि आदमी लुच्चा टाइप के कमेंट करने लगता है और दूसरे को उकसाने में ज्यादा समय लगाता है। उकसाना आसान है और फिर एक दूसरे की माँ-बहन को याद कर लेना और भी आसान है। ऐसे लुच्चे ही हैं फेसबुक पर ज्यादा संख्या में। हमें भी कुछ लोग लुच्चा मानते होंगे, हमें आपत्ति नहीं है।

ऐसे लोगों की फ़ौज हर पार्टी ने तैयार कर रखी है। इन फ़ौजियों का काम ही है दिन भर गाली-गलौज और लफंदरई करना। कुछ नहीं, बस एक बात आप इनके अगेन्स्ट लिखिए कि ये भोज के झूठे पत्तलों की आस में बैठे कटकाहा कुत्तों की तरह मसूड़ों से ऊपर मुँह की चमड़ी खींचे, अपने दाँत निकाले भौंकते हुए झुँड में आ जाते हैं। ये भाजपा में भी हैं, आआपा में भी हैं। और बाकी पार्टियाँ अभी सीख रही हैं।

इन लफंदर फ़ौजियों का शान्तिकाल (जब चुनाव नहीं हो रहे होते) में एक ही काम होता है वो है चालीसा लिखना अपने अपने प्रभु की। चालीसा का भी रूप बदल गया है। मीम बनाते हैं, फोटोशाप्ड ट्रॉल बनाए जाते हैं, आर्टिकल मेनुफेक्चर किए जाते हैं और फिर सुनियोजित तरीके से शेयर किए जाते हैं।

लेकिन शान्तिकाल में भी बवाल का दौर आता रहता है। आमतौर पर शान्तिकाल में हर पार्टी के भक्त अपने बीच ही ट्रॉल शेयर कर के हँसी ख़ुशी मज़े लेते रहते हैं। लेकिन कभी कभी शान्तिकाल में भी जब कोई मालदा, वेमुला, जेएनयू या पुजारी का गेम सामने आता है तो फिर तो “इट्स स्पार्टा” हो जाता है!

इस समय आप लोगों के घिनौनेपन को बहुत क़रीब से और खुले रूप में देख सकते हैं। यही वो समय है जब हर कोई लगभग नंगा हो जाता है लेकिन उस इसका आभाष नहीं होता क्योंकि आसपास सब नंगई ही कर रहे हैं। वैचारिक स्तर इतना गिर जाता है कि पहले कमेंट से ही गाली-गलौज और एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लग जाती है।

ये वो समय होता है जब मुख्य विषय क्या था वो किसी को याद नहीं रहता। जैसे कि आज आपको याद भी नहीं होगा कि उमर ख़ालिद कौन है, क्या कर रहा था। आपको याद भी नहीं होगा कि देश में इन्टोलेरेंस कब टूरिस्ट वीज़ा लेकर आया था और अवार्ड वापसी के वर्क वीज़ा वालों के साथ निकल गया। आपको याद भी नहीं होगा कि छप्पन इन्च का सीना कैसा होता है और ईंट का जवाब पाकिस्तान को पत्थर से कैसे देना है।

इस समय आप बात शुरू ‘भारत की बर्बादी’ से करेंगे और बात पहुँच जाएगी इस पर कि देश में गरीब मर रहे हैं। फिर ये ट्रॉल और इंटेलेक्चुअल पूरे विमर्श की दिशा ‘नॉर्मल से एक्सट्रीम’ लॉजिक का ऊपयोग करते हुए कहाँ लेकर चले जाएँगे, आपको हवा भी नहीं लगेगी। नॉर्मल से एक्सट्रीम का मतलब है कि बात शुरू होगी कि यूनिवर्सिटी में तिरंगा फहराया जाना चाहिए। लेकिन विमर्श में, बहुत ही सटल और चालाक तरीके से, ये सवाल पूछ दिया जाएगा कि इससे क्या फ़ायदा हो जाएगा।

और आपको ये पूछने ही नहीं दिया जाएगा कि इससे नुक़सान क्या हो जाएगा। तर्क और सवाल दोनों ऐसे चुने और गढ़े जाते हैं कि आप शुरू झंडे से होंगे और पहुँच जाएँगे डंडे पर। आप ऐसे मरोड़ दिए जाएँगे कि आपको ख्याल ही नहीं रहेगा कि भारतीय सेना के जवान को परमवीर चक्र देना चाहिए कि हथियार लेकर सरकारी मुलाजिमों को मारने वाले नक्सलियों को।

ख़ैर, इन फेसबुकिया भक्त फ़ौजियों से इतर एक और क्लास होता है। ये लोग रिक्रूट नहीं किए जाते। ये शुरू करते हैं मज़े लेने से और फिर इन्हें पता भी नहीं चलता कि मज़े लेते लेते वो अपनी घृणा के साथ इतने आगे निकल गए हैं कि लौटना मुश्किल हो जाता है।

ये रोज सिर्फ निगेटिव बातें शेयर करते हैं। इस नकारात्मकता को आलोचना नहीं कहा जा सकता क्योंकि हर आलोचना एक समाधान की तरफ ले जाती है। इनकी लिंकबाजी और निगेटिविटी में आलोचना नदारद होती है और एक व्यक्ति-विशेष से घृणा इतनी कि मानो वो इनकी चुराई हुई बकरी का मटन बना कर खा गया हो!

उन्हें वापस लौटने में डर लगता है। ये अपने आप से और हमारे-आपके जैसे दोस्तों से डरते हैं कि पार्टी कैसे बदलें क्योंकि इनकी नंगई भी बाहर दिख चुकी होती है। अपने प्रेम के समर्थन और घृणा का मशाल थामें दोनो ही वक़्त वो नंगे देखे जा चुके हैं। इनके लिए ब्लैक है या व्हाइट है, ग्रे एरिया गायब है। या तो आप हैशटैग जेएनयू के साथ खड़े हैं, या आप कन्हैया को गरियाते हुए जेएनयू बंद कराने पर तुले हैं।

मेरी उन सब से गुज़ारिश है कि वापस लौट लो, कोई देर नहीं हुई है। फ़ौजी बन गए हो तो ठोक कर स्वीकार कर लो। मोदी को गाली देने वालों को ये बख़ूबी पता है कि देश में बढिया काम भी हो रहा है लेकिन मजबूरी में वो फेसबुक पर शेयर नहीं कर सकते, तमग़ा छिन जाने का डर है। वैसे ही केजरीवाल ने भी अच्छे काम किए हैं, दिन रात गाली देने से, लिंक शेयर करने से कुछ नहीं मिलने वाला, ये तुम्हें भी पता है।

लौट आओ। ये घृणा तुम्हें ले डूबेगी। ये फ़ॉग तुम्हारे सामने धुएँ की चादर भी लाएगा और देखने की शक्ति भी छीन लेगा। फ़ॉग के चलते रहने तक मत चलो, थोड़ा साँस रोककर चल लो क्योंकि सड़ाँध आजकल ज्यादा है। धूप में बाहर निकलो, उसमें विटामिन भी है और साफ़ साफ़ दिखाने की क्षमता भी। फिर रिएक्शन नहीं, विचार बाहर आएँगे। फिर तुम लिखने से पहले सोच पाओगे।

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