आज के डिबेट और डिस्कोर्स का स्तर

कॉरपोरेट की नौ घंटे की ग़ुलामी बजाने के बाद, लगभग एक घंटे मेट्रो में बिना सहारे के खड़े होकर सफ़र (अंग्रेजी वाला पन मार लीजिए यहाँ) करते हुए कनॉट प्लेस पहुँचे एक मित्र से मिलने। बड़े बड़े कूड़ेदानों की बदबू लाँघते हुए, ऑडी-बीएमडब्ल्यू की बेतरतीब क़तार को निहारते हुए, सड़क के किनारे खोंपचे में बने एक चाय की दुकान पर पहुँचे जहाँ हम दोनो कभी कभार चाय पी लेते हैं।

सड़क के किनारे के चाय की दुकान का लिखना जरूरी था इसीलिए लिखा। इस चाय के दुकान पर जो बात कही और सुनी गई उसका स्तर बहुत ही बड़े मार्जिन से हमारी संसद की ग़ज़ल गायकी, जेएनयू के विशुद्ध चूतियाप और फेसबुकिया लफंदरई से बेहतर था। हमारे डिस्कशन का टॉपिक भी आज के दौर का डिस्कशन ही था।

जॉब, दुनिया-जहान आदि की बात के बाद बात आजकल के चल रहे विभिन्न डिबेटों पर आकर रुकी। आजकल पूरा का पूरा पब्लिक डिस्कोर्स बाईनरी में चला गया है। ग्रे एरिया गायब है बिल्कुल। आप या तो सड़क के इस पार हैं या उस पार। सड़क चौड़ी है लेकिन उस पर कोई नहीं है। सब यहाँ-वहाँ से खड़े होकर चिल्ला रहे हैं।

सब भक्त ही हैं, और अधिकतर अंधे हैं। जेएनयू में कन्हैया जी, जो कि सड़क पर मूतने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हुए रोकने पर लड़की को ‘देख लेने’ की धमकी देते हैं, चिल्ला रहे थे। चिल्लाते चिल्लाते उनको किसी ने फ़िदेल कास्त्रो बना दिया क्योंकि उनकी ऊँगली उठाने की अदा उनसे मिलती है। क्या कह रहा था एडमिन ब्लॉक में और क्या बोला बारह बजे रात में, आराम से दोयम दर्जे की चुटकुलेबाजी करार दी जा सकती है।

जी, चुटकुलेबाजी से ज्यादा कुछ भी नहीं। अगर आपको उसमें आदर्श दिख रहा हो कि एक ‘विद्यार्थी’ ने मोदी को चैलेंज कर दिया तो आपका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है।

दूसरा भाषण राहुल गाँधी का था लोकसभा में। इस बंदे को ये भी पता नहीं की राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव में क्या बोलना चाहिए। उसकी बातों में कोई चुटकुलेबाजी नहीं थी क्योंकि वो खुद एक चुटकुला है। मैडम-सर के चक्कर से लेकर फ़ेयर एण्ड लवली तक उसने अपनी ही फ़ज़ीहत कराई।

फिर आए मोदी जी भाषण देने। आम तौर पर लोगों कि शिकायत रहती है कि मोदी जी रिएक्शन या तो देते ही नहीं या बहुत लेट और लिटिल क्वांटिटी में देते हैं। लेकिन ना, यहाँ पर वो भी मुद्दा छोड़कर, राहुल गाँधी जैसे टुटपुँजिए सांसद की एक एक बात का माखौल करते दिखे। ये एक दोयम दर्जे का भाषण था जिसमें अपने पार्टी वालों से मेज़ थपथपाने के लिए उत्साहित करने से ज्यादा कुछ मैटर नहीं था।

और केजरीवाल का ‘इज इट ट्रू’ ट्वीट को आपको पता ही है। उसके भाषण का स्तर इतना घटिया है कि मैं कुछ आगे लिखना भी नहीं चाहूँगा। भगवान दिल्ली को इतना टैक्स देता रहे कि बेचारे पठानकोट के ‘पंजाबी’ शहीदों को एक-एक करोड़ देते रहें।

भक्त होने में कोई बुराई नहीं है। अगर तुम्हारा भगवान शिव के जैसा हो तो गर्दन भी काटकर लोग अर्पण कर दें। लेकिन क्या कोई भी उस स्तर का है? मुद्दे पर कितने लोग बात कर रहे हैं? तुम चौरासी पर बात करोगे, वो दो हजार दो ले आएँगे। तुम पूछोगे माल्या कहाँ गया तो वो बोलेंगे क्वात्रोची याद है कि नहीं। तुम बोलोगे भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, वो बोलेंगे यहाँ से तीन हजार कंडोम निकलते हैं!

मेरी पूरी टाइमलाइन पर तीन से चार लोग ऐसे हैं जो जो भी लिखते हैं विस्तार से लिखते हैं और हर बात तर्कसंगत लिखते हैं। बाकियों का सारा ज्ञान अपने से सहमति ना रखने वालों को टार्गेट किए हुए चार लाइनों में सिमट कर रहा गया है। अपने विचार तो देना लोग भूल चुके हैं क्योंकि लाइक के लिए चुटकुलेबाजी सबसे सस्ता रास्ता है।

पचास लाइक आ जाते हैं और लोग अपना जीना सफल मानने लगते हैं। दो मिनट अपना लिखा लोग पढ लें कि क्या टट्टी कर रहे हैं फेसबुक पर तो खुद ही बदबू के कारण डिलीट मार देंगे। लोगों ने लिखकर पढ़ना भी बंद कर दिया है। लाइक गिनते रहते हैं दिन भर।

जेएनयू के विचार का ये स्तर होगा ये मैंने कभी नहीं सोचा था। फेसबुक पर जनता वाह-वाह करेगी ये तो पता था लेकिन जेएनयू में इस तरह के चिरकुटई को इतनी तूल दी जाएगी… ये एक फर्जी आईकॉनिफिकेशन से ज्यादा कुछ नहीं। जिनको कन्फ्यूजन हो वो मेरा ये पोस्ट सेव कर लें, कन्हैया की अवसरवादिता साल-दो साल में सामने आ जाएगी या फिर वो इस देश के सैकड़ों घरेलू गायकों की तरह गायब हो जाएगा जिसकी माँ को लगता है कि वो पुरूष होकर भी लता से अच्छा गाता है।

राहुल-मोदी वाला लोकसभा डिबेट तो हद दर्जे की गिरी हुई हरकत थी। पचास साल का युवा और भारत के तथाकथित सशक्त प्रधानमंत्री ऐसी बातें कर रहे थे मानो एक ने दूसरे के हिस्से की चॉकलेट खा ली हो। ये स्तर है लोकसभा के डिबेट का? व्यक्तिगत टिप्पणियाँ और ‘ही ही हा हा’ कराने वाली बातें! ये बेवक़ूफ़ी है मोदी जी। राहुल गाँधी की बात को उसकी माँ सीरियसली नहीं लेती और आपने एक एक लाइन को इतनी तरजीह दी कि लगा देश में मुद्दे कम पड़ गए हों!

चाहे वो मोदी के फ़ैन हों या राहुल के या कन्हैया के, आप सब ये जान लीजिए कि इन तीनों ने पिछले दिनों कुछ भी ऐसा महान नहीं किया है जिसे डिफ़ेंड किया जा सके, ख़ासकर भाषणबाज़ी के संदर्भ में। साला लोकसभा में कोई गजल सुना रहा है, कोई ट्रॉल टाइप योजनाओं के नाम बदल रहा है… इसीलिए चुनकर भेजते हैं आपलोग इन्हें?

अपने आप को टटोलिए। इस चुटकुलेबाजी से बचिए। हँसने में मनाही नहीं है, लेकिन ध्यान रहे कि हर बार हँसिएगा तो नेता सब (कन्हैया इन्क्लूडेड) डिबेट का स्तर इतना गिरा देंगे की वो कॉमेडी नाईट्स का बाद वाला सड़ा हुआ एपिसोड लगने लगेगा। हमारे नेताओं और छात्रनेताओं (केजरीवाल को छोड़कर काहे कि उनके पास कोई प्रभार नहीं है, वो बस लालबाबू बनकर चूल में तेल डाले मुख्यमंत्री बने फिरते हैं ट्वीट लिखते हैं) में काफी पोटेंशियल है।

मुद्दे पर बात होने लगे तो देश सच में बदलाव की तरफ मुड़ेगा। वर्ना हँसाने के लिए तो हर गली में मसखरे घूमते रहते हैं। मेज़ ही थपथपाना है मोदी जी भाजपाइयों को, तो वो काम तो ‘मन की बात’ में बोल दीजिए हर स्कूल के लौंडे रिकॉर्डिंग भेज देंगे। संसद में काम कर लीजिए आप लोग। केजरीवाल जी आप भी, आपको मूवी रिव्यू के लिए दिल्ली ने वोट नहीं दिया है ना ही दूसरे राज्यों के फटे में सेलेक्टिव टाँग अड़ाने के लिए। राहुल जी तो हमारे भविष्य के प्रधानमंत्री हैं, ये हमको भी पता है और आपको भी। मानने से डर लगता हो तो अलग बात है।

इन चुटकुलेबाजों को बढ़ावा मत दीजिए। उन स्टेटस को लाइक मत कीजिए जो ठिठोली करते हों। कोई चार लाइन ही लिख रहा हो, आपके विचारों के इतर भी हो पर तर्क हो तो उसको लाइक कीजिए, कमेंट कीजिए। पैसिव लिसनर मत बनिए, आपके पास प्लेटफ़ॉर्म है बातों को पढ़ने और समझने का, विचार दीजिए। मेज़ थपथपाने से कुछ हासिल नहीं होता, शेम-शेम चिल्लाने से कुछ हासिल नहीं होता, तीन हजार कंडोम के डस्टबिन में निकल आने ले कुछ हासिल नहीं होता और अपने आकाओं के झंडे फहराने से भी कुछ हासिल नहीं होता।

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