विशेषणहीन दलित का कोई माय-बाप नहीं होता

अभी ये तस्वीर देखी, आप भी देखिए। बिहार की है, जहाँ से महावीर पैदा हुए जिनके विचारों में मच्छर मारना भी हिंसा है। ये तस्वीर कोई अलग नहीं है। हाँ इसका रंग अलग है। ये भी एक ‘दलित’ है। इसे एक मशीन में पीस दिया गया। और उसकी आँत बाहर आ गयी है। “ये तस्वीर ‘ग्राफ़िक’ है,” हमारी कलीग ने कहा, “लोगों में इंसानियत नहीं बची एकदम …”
 
अब मुझे कोई ये बताये की एक दलित को क्या क्या होना चाहिए जिस पर समाज के लोग उसकी मौत पर चर्चा करें की ये क्यों मरा या मरी। एक दलित का स्कॉलर होना महीने भर पहले तक लग रहा था जरुरी था और तब मरने से पूरे देश को दलित विमर्श की याद आई और बाबा साहेब तक खींच लिए गए।
 
एक दलित का किसी चुनाव होने वाले राज्य में मरना भी दलित विमर्श के लिए जरूरी है। एक दलित का, अभी के हालात देखते हुए, भाजपा शासित राज्य में मारना भी ज़रूरी है। ये मौत उस पुलिस वाले की मौत की तरह है जो चोर का पीछा करते हुए नहीं बल्कि किसी कुत्ते के काटने से मर जाता है।
 
इस मौत पर कन्हैया, रविश, अरविन्द, राहुल, मोदी, सुषमा, मायावती सबको बोलना चाहिए। इन मौतों पर बोलने से मौतें घटेंगी। इन पर कुछ करने से मौतें घटेंगी। इनको चारा मत बनाइये। चारा बनाओगे तो घृणा फैलेगी और ये मौतें होती रहेंगी। क्योंकि इससे किसी की दुकान चल रही है।
 
एक आदमी को मशीन में पीस कर मार दिया गया और आप विशेषण खोज रहे हैं कि वो स्कॉलर है, भाजपा वाले राज्य में है, चुनाव होने वाले हैं की नहीं, इसपर बात करने से मेरे अजेंडे को क्या फायदा होगा …
 
सीरियसली, सालों डूब मरो सब के सब। घिन आती है ऐसे छद्म-बुद्धिजीविओं, दोगले नेताओं, मौकापरस्त विचारकों और दलित चिंतकों के दौर में ज़िंदा होने पर। आपको ऐसा हिंदुस्तान मुबारक हो।
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