विराट को विराट ही रहने दो, कोई नाम ना दो

सचिन तेंदुल्कर वो नाम है जो क्रिकेट का पर्याय है हमारी पीढ़ी के अधिकतर लोगों के लिए। हमने सचिन को बयानवे के लिबरलाइजेशन से लेकर आठ के लीमैन ब्रदर्स कॉलेप्स और तेरह के वानखेड़े तक देखा है। सचिन हमारे लिए वो नाम है जो भारत के किसी क्षेत्र में अच्छा करने के गौरव से जुड़ा है वो भी उस दौर से जब हमारे पास दुनिया में दिखाने को कुछ था नहीं।

एमआरएफ़ का वही बल्ला जिस पर जीनियस लिखा होता था, आज दूसरे हाथ में है। है तो कई हाथों में पर टैटू वाले हाथों में वो वैसे ही शोभता है जैसे भीम के हाथ की गदा, अर्जुन का गाँडीव या फिर थॉर का हथौड़ा। सचिन ने एक पीढ़ी की उम्मीदों को ढोया है वी-५००, एमआरएफ़ और एडिडास के एसटी वाले बल्ले के साथ। हजारों रन लगे हैं और करोड़ों दिल धड़के हैं।

भारत में बेहतर बल्लेबाज़ों की कमी कभी भी नहीं रही। गावस्कर को देखने वाले उसके आगे किसी को नहीं मानते, सचिन और द्रविड़ वालों का भी यही हाल है, और कल को कोहली (अगर उनकी राह ठीक रही) का भी वही हाल होगा। वो महान हो जाएगा।

तो क्या अभी महान नहीं हैं? जी नहीं। बिल्कुल नहीं। आँकड़े किसी को महान नहीं बनाते। महानता एक संपूर्णता है, जिसमें हर एक हिस्से के साथ साथ उस संपूर्णता का भी योगदान होता है। कोहली उस राह पर ज़रूर हैं, लेकिन वो अपनी मंज़िल से काफी दूर हैं।

हम इन्स्टा कॉफी के युग में जी रहे हैं। कोहली का महान होना और अनुष्का को उसकी असफलता का जिम्मेदार ठहराने में आपको बस दो इनिंग लगते हैं। आज दौर विश्लेषण का नहीं, रिएक्शन का है। कोहली की ‘महानता’ जो हम और आप उस पर उसकी पचीस पारियों के नाम पर थोप रहे हैं, वो हमारा इन्स्टा-रिएक्शन है। 

खुद को धोखा मत दीजिए ये कहकर कि कोहली को एक मैच जिताते देखकर आपको उसके बाकी सारे मैच याद आते हैं और आपका दिमाग पूरा प्रोसेस करता है, आप अपने दोस्तों से बहस करते हैं और तब ये परिणाम निकालते हैं कि नहीं, कोहली वाक़ई में महान हैं।

ऐसा नहीं होता। कोहली ने छक्का मारा तो वो हीरो है, और दो इनिंग, आज का सेमिफ़ाइनल और रविवार का फ़ाइनल, नहीं चला तो आपको सड़क पर उतर कर पुतले जलाने में देर नहीं लगेगी। और फिर आप अनुष्का शर्मा से लेकर उसकी माँ, बहन, भौजाई सब को याद कर लेंगे। ये होता है हमारा और आपका विश्लेषण। महान आदमी के साथ ये दिक्कत नहीं होती, क्योंकि महानता तक पहुँचने में मीडिया के विशेषण और दो साल के खेल के आँकड़े मात्र नहीं होते।

ग़ुस्सा मत होइए। हम और आप विशेषणों के ऐसे युग मे जी रहे हैं जहाँ एक खिलाड़ी के दो शतक लगातार लगाने से ही उसे डॉन ब्रैडमेन बोला जाने लगता है। हमने और आपने पिछले दो साल में ही बहुत ज्यादा महान लोग देख डाले हैं जैसे कि स्टीव स्मिथ, एबी डिविलियर्स, जो रूट, विराट कोहली आदि आदि। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि विराट कोहली अभी बहुत अच्छी बैटिंग कर रहे हैं, अपने खेल को लेकर गंभीर हैं और उन्होंने ना सिर्फ अपना वाह्यावरण बल्कि अपने पूरे अंदरूनी व्यक्तित्व को बदला है। उनके अप्रोच में समझदारी और ज़िम्मेदारी का प्रतिबिम्ब है लेकिन उन्हें अभी सचिन करार देना, ब्रैडमेन बना देना तर्कसंगत नहीं लगता। उन्होंने भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीख लिया है और संयम के साथ अपने पूरे खेल को खेलते कम और निभाते ज्यादा हैं।

खेलने और निभाने में फ़र्क़ है। खेलना कई बार खेलने के लिए होता है, वैयक्तिक भी हो सकता है लेकिन निभाना अपनी टीम के लिए होता है। इसमें आपको पूरे परिदृश्य का ख्याल करना होता है और अपने पूरे खेल को परिस्थिति के हिसाब से ढालना होता है। उस वक़्त आप कोहली कम और नंबर तीन पर आए टीम का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा ज्यादा होते हैं।

आँकड़ों, और कितने मैच में लक्ष्य का पीछा करते हुए कोहली ने शतक जड़े हैं जिनमें जीत मिली है ये सब लिखने की बातें नहीं हैं। वो सब इंटरनेट पर हैं और हमारे दिलो दिमाग में भी। हम प्रेम करने लगते हैं अपने पसंदीदा खिलाड़ियों से और फिर जज़्बाती होकर उन्हें सच में अपनी प्रेमिका या प्रेमी मान लेते हैं और फिर उस पर अपने अपेक्षाओं का अत्याचार करते हैं।

इससे बचना चाहिए। कोहली, कोहली हैं और कोहली ही रहेंगे। तेंदुल्कर कभी डॉन ब्रैडमेन नहीं हुए। डॉन ब्रैडमेन कभी तेंदुल्कर नहीं हो पाते। गावस्कर कभी कोहली नहीं हो पाते। अश्विन कभी मुरलीधरन नहीं होंगे। कोहली को कोहली ही रहना चाहिए।

एक घिसी पिटी बात तो हम हमेशा सुनते ही हैं कि सबने अलग अलग समयों में खेला है इसीलिए तुलना करना बेमानी है। क्या ‘गेंग्स ऑफ़ वासेपुर’ की तुलना ‘तनु वेड्स मनु’ से हो सकती है? नहीं, क्योंकि दोनों दो अलग फ़िल्में है। एक लाल है, दूसरा हॉट पिंक। आँकड़ों का क्या है, उसके पीछे की मेहनत, उसके पीछे की असफलताएँ, उन असफल पारियों के पीछे की बनावटी कहानियाँ, ये कहाँ बताते हैं आँकड़ें! 

कोहली खुद ही में एक नाम है। विराट कोहली को दूसरे नाम की ज़रूरत नहीं है। विराट कोहली को खुद एक नाम बनने दीजिए। उनकी बैटिंग एक फीलिंग है, उसको महसूस कीजिए, नामकरण जो उनके माता-पिता ने किया वो काफी है, आप बेवजह पंडित मत बनिए।

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