NIT श्रीनगर पर बुद्धिजीवियों की ख़ामोशी बहुत कुछ कहती है

छोटी सी ज़िंदगी है मेरी और बहुत कम अनुभव है चीजों का। लेकिन तीस साल की उम्र में, आज तक, मैंने ये नहीं सोचा था, या कभी ऐसा लगा नहीं था कि हम उस दौर में भी होंगे जब तिरंगा फहराने पर एक राज्य सरकार की पुलिस छात्रों को पीटेगी, और कल तक छात्रहित की बात करने वाले तमाम प्रबुद्ध प्रकाशपुंज शाम की चाय पीते रहेंगे।

इस दौर में फेसबुकिया और ट्विटरिया बुद्धिजीवियों की सन्नाटेदार ख़ामोशी अपेक्षित भी है क्योंकि यहाँ से उनका कोई उद्देश्य परिपूर्ण नहीं होता दिखता। ये ख़ामोशी बहुत कुछ कहती है। यहाँ तक भी पचा गए हम सब कि भाई, कोई भारत माता की जय नहीं बोल रहा तो क्या हर्ज है, ना बोले। ये उसकी अपनी इच्छा है और जायज़ है कि उसका मन नहीं है। कोई उत्तरी कोरिया तो है नहीं कि यही हेयर स्टाइल रखना है!

 ये बहुत अच्छी बात है कि हम ‘मानवतावादी’ हैं और देश की सीमाओं से परे देखना चाहते हैं। देखिए, और दूरबीन लगाकर देखिए, कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तब है जब आप अपने ‘डिसेन्ट’ और ‘फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ के चक्कर में एक बहुत ही ज्यादा टॉलरेंट मेजोरिटी को खुल्लमखुल्ला चैलेंज कर बैठते हैं।

बीफ़ खाने से हिंदुओं को कभी दिक्कत नहीं थी। लेकिन वही बीफ़ अगर आप सड़क पर बैठकर उन्हें उकसाने के लिए खाओगे, ये कहकर कि ये तुम्हारा अधिकार है तो बहुत ही क्षोभ के साथ कहूँगा कि आप मानसिक रूप से बीमार हैं। ज़रा सोचिए कि रितिक रौशन ने पोप पर एक नॉर्मल सी बात कह दी और ईसाई लोग बुरा मान गए। और मोहम्मद का कार्टून बनाने पर शार्ली एब्दो का क्या हुआ, ये सबको पता ही है।

उसी तरह तुम्हारे काले झंडों से एक मेजोरिटी को, जो अपने आप को देशभक्त कहती है, कारण जो भी हो, कोई दिक्कत नहीं है। तुम्हारी भारत माता या तिरंगे को लेकर तटस्थता पर भी कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तब है जब तुम अपनी तटस्थता बरक़रार रखते हुए, चूँकि ये मेजोरिटी टॉलरेंट है, उसकी भावनाओं पर खुला आक्रमण करते हो।

 अभी तक ये आक्रमण वैचारिक था, पिछले कुछ दिनों में लाठीचार्ज और कपरफोड़ी में तब्दील हो चुका है। खैर विचारों के नाम पर केरल, छत्तीसगढ़, बंगाल में कितने मरे-कटे हैं उनको गिनाने की ज़रूरत नहीं है मुझे। मैं पीछे नहीं जाउँगा, मैं बस ये समझना चाह रहा हूँ कि तुम काले झंडे लेकर भारत की बर्बादी का जश्न करते हो और तुम्हारे पीठ पर पचास पुरोधा, तुम्हारे इस हरकत के बचाव में होते हैं, लेकिन कोई इस भारत की धरती पर तिरंगा फहराना चाह रहा है तो उस पर पत्थरों, रॉडों और डंडों से क्यों वार करते हो?

कहाँ गई तुम्हारी बोली? कहाँ गुम हैं हमारे राजदीप, बरखा, रवीश सरीखे लोग? क्यों कोई इस पर चर्चा भी नहीं कर रहा? क्या श्रीनगर के छात्रों पर हमला नहीं हो रहा? अरे मोदी की ही सरकार वहाँ भी है, लपेटने के लिए ही सही कुछ तो बोल लो! आज भी तो बोल लो कि दादरी तो दिल्ली के बगल में है इसीलिए वहाँ चले गए हम! आज भी तो कोई एक मिनट की मोमबत्ती जला लो टीवी पर!

या तुम इंतजार करोगे कि किसी छात्र की मौत हो जाए। फिर तुम उसके जेब से उसकी आइडेंटिटी बरामद करोगे। फिर तुम देखोगे कि वो मुसलमान है कि नहीं। फिर तुम देखोगे कि दलित है कि नहीं। और फिर तुम देखोगे कि इस बात का फ़ायदा मुझे या मेरे ख़रीदारों को है या नहीं। 

फिर तुम्हारे अँगूठों में हरकत होगी। फिर तुम्हारी जेब से स्मार्टफ़ोन निकलेगा। फिर तुम ट्वीट करोगे, फेसबुक पोस्ट लिखोगे, टीवी पर मोमबत्तियाँ जलाओगे। 

और फिर तुम कहोगे कि इस छात्र की मौत का जिम्मेदार कौन है। तुम एक ईसाई को दलित, दलित को मुसलमान, मुसलमान को स्कॉलर, स्कॉलर को पता नहीं क्या बना दोगे। और क्योंकि ये तुमने बनाया है, और कई बार चलाया है, ये चलेगा और हिटलरिया फ़लसफ़े के हिसाब से बार बार दोहराया गया तुम्हारा ये प्रतिपादित झूठ सच हो जाएगा।

 लेकिन सच ये है कि छात्र तो मर ही चुके हैं। जिस देश में छात्र और विश्वविद्यालय पढ़ाई को छोड़कर हर बात के लिए चर्चा में रहें, वहाँ छात्र की मौत पहले ही हो चुकी है। ये चलती फिरती लाशें तो गिद्धों के नोचने के लिए वहाँ सड़ने का इंतजार कर रही हैं। 

मत भूलो कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी है दिशा दिखाना। आज स्वयं तुम दिशाहीन हो गए हो। तुमने व्यक्ति को व्यक्ति नहीं, अपने लिए इस्तेमाल किया जा सकने वाला एक मुद्दा और राजनीति के लिए महज़ एक वोट से ज्यादा कभी माना ही नहीं है। 

 धीरे धीरे ये नक़ली चेहरा धुलेगा, तुम्हारा नक़ाब उतरेगा। तुम जिस गली से होकर आते हो, वहाँ की लाइटों के रंग ओढ़े हुए, वहाँ की गँदली बदबू से सने लिबासों में, वहाँ की सड़ाँध अपने फेफड़ों में उतारे, ये सब ख़त्म हो जाएगा। तुम्हारा तिलस्म टूटेगा। तुम जगोगे।

और जब जगोगे तो ये दुनिया बदल चुकी होगी जिसमें तुम्हारे रहने की जगह नहीं होगी।

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