TOI फ़्रंट पेज काँड: नॉन-कॉन्वेंटेड मानसिकता वाले शेखर गुप्ता के नाम खुला पत्र

प्रिय शेखर गुप्ता जी,
टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज फ़्रंट पेज पर केट मिडल्टन का ‘अपस्कर्ट मोमेंट’ छापा है। बहुत लोग ग़ुस्से में हैं। कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि इनसे और किस बात की उम्मीद है। 

हमको ज्यादा की उम्मीद थी। आपने ट्वीट करके कहा कि इस पर बेकार की हायतौबा मच रही है क्योंकि ब्रिटेन वाले अपने शाही ख़ानदान के लोगों को ग्लैमर आइकॉन की तरह देखते हैं और हम भारतीय लोग ‘कन्वेंटेड टाइम्स’ में ट्रैप्ड हैं।

गुप्ता साहब, आप पत्रकारिता के स्तंभ माने जाते हैं लेकिन कभी कभार बरड़ जाते हैं। बरड़ना एक मानसिक और भौतिक प्रक्रिया है जब व्यक्ति उल्टा सोचते हुए उल्टे रास्त पर चल पड़ता है।

गुप्ता साहब आपकी सारी बात सही है कि ब्रिटेन वासी अपने शाही परिवार को ग्लैमर आईकॉन की तरह देखते हैं लेकिन जरा ये बताएँ कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया ब्रिटेन के कितने लोग पढ़ते हैं? या फिर ये कि क्या बकिंघम पैलेस भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया लेता है?

और कॉन्वेंटेड मानसिकता से क्या तात्पर्य है आपका? ये फोटो अगर दिल्ली टाइम्स के किसी पन्ने पर छपती तो समझ में आती है। आपने पत्रकारिता छोड़कर अगर समाज पर फैसले सुनाना शुरू कर दिया है तो बात अलग है। कॉन्वेंटेड मानसिकता का मतलब है कि हम ईसाई ननों की तरह बहुत ज्यादा बंद हैं अपने विचारों और आचारों में।

पर क्या केट मिडल्टन के नितम्बों की तस्वीर देख लेने और उस पर, अपनी पत्रकारिता के एथिक्स को बगल के पीकदान में फेंकने के बाद, वाह वाह करने से आप बहुत ही खुली मानसिकता के परिचायक हो गए? क्या अब फ़्रंट पेज पर यही छपेगा! क्या ये आपके गले फाड़कर और क़लम से क़त्लेआम मचा देने वाले ‘अच्छे दिन की खोज’ का अंत मान लिया जाय?

क्या लातूर में पानी की कमी में मरता किसान उस स्कर्ट और संपादक की ‘नॉन-कॉन्वेंटेड’ सूझबूझ के नीचे तृप्त हो गया? क्या अचानक से देश का सबसे प्रमुख मुद्दा किसी के स्कर्ट का हवा में उड़ना हो गया?

और जिंदगी भर तमाम ‘-वादों’ पर बवाल काटने वाले आपके नारीवादी चिंतक मन का क्या हुआ! क्या ये महिलाओं का कमोडिफिकेशन नहीं है? या फिर नॉन-कॉन्वेंटेड होने के चक्कर में आप पत्रकारिता के इस वैचारिक (और भौतिक) नंगेपन को भारत की गर्त में जाती शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्या आदि से ऊपर आँकते हैं?

आप तो इतने कमाल के पत्रकार हैं कि देश में एक बार मिलिट्री कू करा चुके हैं, इस बार क्या आपकी समझ घास चरने चली गई?

मुझे ये समझ में नहीं आता कि जिस व्यक्ति का लिया गया इंटरव्यू बीच के पन्ने पर एक से दो पूरा पेज ले लेता है वो इस बेहूदी और घटिया हरकत पर तीखी प्रतिक्रिया देने वाले को ‘कॉन्वेंटेड’ मानसिकता में उलझा हुआ कैसे बता रहा है! 

एक राजवंश के प्रतिनिधि, वो भी वो जिसने आप पर राज किया दो सौ साल, आपके शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहा है और देश का सबसे ज्यादा बिकने वाला अंग्रेजी अख़बार उसमें उड़ते स्कर्ट की तस्वीर डालता है और एक ही लाइन में लिखता है कि ‘श्रद्धांजलि देते समय’ केट मिडल्टन के लिए मार्लिन मुनरो मोमेंट हो गया, और आपको उस घटिया तस्वीर के फ्रंटपेज पर छपने से आपत्ति नहीं तो आपको पत्रकारिता से रिटायरमेंट ले लेना चाहिए।

गुप्ता जी, आपने ‘गुप्ता जी के लौंडे’ के महान नाम को नीचा दिखाया है जो हम सबके बापों के लिए आदर्श हुआ करता था।

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