बाप के पैसों का कैमरा लेकर अब सब लौंडे ‘फ़िल्ममेकर’ होने लगे हैं!

कभी कभी कोई मित्र, पूर्व छात्र, फ़ेसबुक फ्रेंड आदि हमारे साथ कोई विडियो शेयर कर के राय माँग लेते हैं कि कैसी लगी आपको, बताइएगा। हमसे क्यों राय माँगते हैं, ये हमें पता नहीं लगा लेकिन हो सकता है कि उन्हें लगता हो कि हमें ज़्यादा समझ में आती है बातें। बता दूँ कि हमें ज़्यादा समझ में नहीं आती, उतनी ही आती है जितनी आपको। 

आजकल एक नया दौर चला है ‘फ़िल्म मेकर’ बन जाने का। इससे पहले एक दौर था ‘फ़लाना-ढिमका फ़ोटोग्राफ़ी’ का। उसमें लोग डीएसएलआर लेकर ‘फ़ोकस-आउट ऑफ़ फोकस’ खेलते हुए ब्लैक एण्ड व्हाइट या फिर चिड़िया, पत्ते, ओस की बूँद आदि की फ़ोटो खींचकर एकम्पलिश्ड फ़ोटोग्राफ़र हो जाते थे।

समय के साथ साथ वो दौर अब जा चुका है। जो अभी भी अपने आप को इस दौर में मान रहे हों, तो बता दूँ कि आप आउटडेटेड हो चुके हैं। कैमरे से विडियो बनाकर समय के साथ चलिए।

ख़ैर, फ़िल्ममेकर के दौर पर बात कर रहा था। इस दौर में आदमी (अच्छे वालों को छोड़कर निन्यानवे दशमलव सात प्रतिशत) कोई ऐसा टॉपिक उठा लेगा और उसका वो हाल कर देगा, हिलते हुए फ़्रेम, ज़्यादा डार्क टोन, ग्रेनी शॉट्स और बिना किसी आवाज़ के सिर्फ़ म्यूज़िक के साथ, कि आप को मिले तो आप सर पकड़ के बैठ जाएँ। 

अधिकतर बार लोग उसे समझ ना पाने के बाद ‘पीयर प्रेशर’ में अच्छा कह देते हैं जबकि उनको बिलकुल भी पता नहीं होता कि फ़िल्म के नाम पर टट्टी की हुई है ब्लैक एण्ड व्हाइट में। मतलब हॉन्टिंग म्यूज़िक, चरचराता बैकग्राऊँड साउंड, हिलता फ़्रेम, धुँधली तस्वीरें… बाप रे बाप! हमारे तो पल्ले नहीं पड़ता।

ऐसा है कि ये शॉर्ट फ़िल्ममेकिंग अब मॉडर्न आर्ट होता जा रहा है। कुछ भी अजीब का बना दो और लोगों को समझने बोलो। ये क्रिएशन ऑफ़ आर्ट नहीं, बकवास कहा जाएगा। और अगर आप कुछ कहना चाह रहे हैं जो मुझे समझ में नहीं आया, तो ग़लती फ़िल्ममेकर की है, ऑडिएन्स की नहीं।

एक क्रिएटर कॉम्प्लेक्सिटी को सिम्प्लीफाइ करता है, उसके उलट नहीं। फ़िल्ममेकर की ख़ासियत कहानी को बयाँ करने में होनी चाहिए ना कि दर्शक को पागल बनाने में। अगर आपकी फ़िल्म एक सीधे दिमाग़ वाले व्यक्ति की समझ में नहीं आ रही तो आप असफल हैं। 

और कोई दूसरा तर्क नहीं है। कम से कम मेरे लिए तो ऐसा ही है। हम ज़बरदस्ती का नहीं कहेंगे कि ‘आ हा हा! बेहतरीन कैमरावर्क है, क्या फ़्रेम लिया है’ जबकि आपने ‘कुछ नया’ करने के चक्कर में आम जनता की मनोदशा से खेलने की कोशिश की हो। या ये चाह रहे हों कि ‘हमें तो पता नहीं चला हमने क्या बनाया है, कोई दूसरा ही समझ जाए!’

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