उनके नाम जो कहानी कहना चाहते हैं फ़िल्म बनाकर

ये पोस्ट मेरे उन मित्रों और छात्रों के लिए हैं जो फ़िल्मकार बनना चाहते हैं। ख़ासकर उनके लिए जो कहानी कहना चाहते हैं, लिखना चाहते हैं और फिर डायरेक्ट करना चाहते हैं। 
बीस से पच्चीस साल के होने का दौर वो दौर होता है जब हर कोई कुछ रिवॉल्यूशनरी या ‘हटके’ करना चाहता है। हर कोई ऐसी कहानी कह देना चाहता है जो पहले कही ना गई हो। हर कोई वो फ़िल्म बनाना चाहता है जो किसी की समझ में ना आए, या एकदम ही दिमाग़ खुरच डाले।

ये सोचने में, अपने चार लड़कों के बीच चर्चा करने में अच्छा लगता है। और सोच अच्छी है, इसमें कोई दोराय नहीं। दिक़्क़त तब है जब ये नया नया फ़िल्मकार अपनी सोच को ख़ुद ही नहीं समझ पाता। इस चक्कर में कि ‘मैं कुछ नया करूँगा’, प्रोजेक्ट के बीच में वो जान जाता है कि ये कचड़ा बन गया है। फिर भी वो अपने ईगो को सटिस्फाय करने के लिए नहीं रुकता और कचड़ा बना लेता है।

ज़ाहिर सी बात है कि हर स्टूडेंड फ़िल्मकार ऐसा नहीं करता। कुछ लोग वाक़ई अच्छा काम करते हैं। 

सबसे पहले हमें कहानी क्या होती है, और हम जो कहानी कहने जा रहे हैं उससे क्या हासिल हो रहा है, ये बात समझ में आनी चाहिए। अगर इन दो सवालों के उत्तर आपने ख़ुद को समझा लिए, तो आपकी फ़िल्म का विषय हटके हो ना हो, फ़िल्म अच्छी ज़रूर बनेगी। 

विषय ज़रूरी नहीं कि हटके या नया हो। आप मंटो की कहानी ले लीजिए, चेखव की कहानी ले लीजिए, प्रेमचंद की कहानी ले लीजिए… रामायण, महाभारत, पुराण का कोई क़िस्सा उठाइए और उसमें अपना नज़रिया डालिए। आप अपने दोस्त के साथ बीती कोई घटना ले लीजिए। वो ज़्यादा लग रहा हो तो कहानी जैसी है, वैसी ही दिखाइए। देवदास तीन बार बनी, देव डी भी बनी और सब के सब अच्छे रहे। 

प्रेम कहानियों पर कितनी फ़िल्में बनी हैं! बिलकुल सेम प्लॉट पर सैकड़ों फ़िल्में लेकिन समान होने के बावजूद फ़िल्ममेकर के अन्दाज़-ए-बयाँ के कारण वो बेहतरीन फ़िल्मों में शुमार है। आपकी भी तो कहानी होगी, वही कह दीजिए। अगर आपमें कन्विक्शन है, तो कहानी कितनी भी घिसी-पिटी क्यों ना हो, वो बेहतर बनकर निकलेगी।

मूलतः फ़िल्म में एक कहानी होती है, जिसको कुछ लोगों या दृश्यों के ज़रिए कैमरा तक पहुँचाया जाता है। इन तीनों बातों पर आप कहाँ है वो देखिए। क्या आपने अपनी फ़िल्म को बनने से पहले देखा है अपने दिमाग़ में? अगर हाँ, तो क्या आपको वो वैसी ही दिखी जैसी आपने सोच रखी है? अगर नहीं, तो फिर आप फ़िल्म ना बनाएँ। फ़िल्मकार को कहानी कैमरे के सामने आने से पहले दिख जानी चाहिए।

और अपनी कल्पना में चलते दृश्यों को देखकर वो सामने के दृश्य फ़िल्माता है। अगर आप यहाँ असफल हैं तो आप कुछ दूसरा काम कीजिए, फ़िल्म आप से बन ज़रूर जाएगी, पर अच्छी नहीं होगी। 

अपने एक्टर्स को चुनना एक अलग काम है। क्योंकि वो आपका दोस्त है और उसने आपसे कह रखा है, इसका मतलब ये नहीं कि वो बेहतर अभिनय करेगा। आप अपनी दोस्ती के नाम पर अपनी कृति के साथ कॉम्प्रोमाइज कर रहे हैं। ऐसे लोगों को विनम्रतापूर्वक मना कर दीजिए। रोल उन्हें ही दो जो आपके दिमाग़ में फिट दिख रहे हों। आपके दोस्त अच्छे एक्टर या एक्ट्रेस हो सकते हैं, लेकिन क्या वो आपकी इस कहानी में सही रहेंगे? 

समझौता मत कीजिए, वरना वो आपके फ़ाइनल कट में दिख जाएगा। आँखें एक एक फ़्रेम में चलती तस्वीर समझ लेती हैं, आपका मित्रप्रेम आपकी पूरी कहानी को डुबा सकता है।

एडिटिंग में भी कोशिश आपकी ये रहे कि कम समय और कम शॉट में आप ज़्यादा कह सकें। तात्पर्य यह है कि आप ख़ुद से पूछिए कि क्या से सीन वाक़ई कहानी को आगे बढ़ा रहा है! क्या इसको हटाने से कहानी का फ़्लो टूट रहा है, या मायने अलग निकल रहे हैं। इस सवाल का उत्तर ईमानदारी से देने पर आप सीन को रखने या हटाने का सही निर्णय ले पाएँगे।

एक डायरेक्टर या फ़िल्मकार को पाँच दिमाग़ की मदद नहीं लेनी चाहिए। दो डायरेक्टर हैं तो दोनों को हर वक़्त, जब आप शूट कर रहे हों तब, एक ही बात बोलनी चाहिए। आपको एग्रीमेंट में होना बहुत ज़रूरी है। जितनी भी बातें डिबेट की हैं, वो कैमरा के बाहर निकलने से पहले ख़त्म कर लीजिए। इससे कहानी वहीं होगी, जो आपने देखा है। 

कभी कभार शूटिंग करते करते कुछ आइडिया आ जाते हैं, तो उसको भी रखने में कोई बुराई नहीं बशर्ते आप एकदम कन्विनस्ड हों। आपका कंट्रोल में होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। अगर आप कहीं भी ढीले हो रहे हैं तो फ़िल्म ढीली ही होगी।

कहानी के चुनाव को लेकर बहकिए मत। भिखारियों की कहानी, वेश्याओं की कहानी, सामाजिक समस्याओं की कहानी आदि बहुत ही सीधे तरीक़े से कही जा सकती है। उसके लिए बिना बात का सिम्बॉलिज्म डालना ज़रूरी नहीं है। आपका उद्देश्य सीधी तरह से अपनी बात पहुँचानी होनी चाहिए। बेहतरीन फ़िल्म का मज़ा ये है कि वो अपेरेंटली भी एक मतलब दिखाती है, और एक डीपर लेवल पर भी कुछ कहती है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप ज़बरदस्ती का ‘डीप’ डायलॉग डाल दें जो कैरेक्टर के मुँह से आउट ऑफ़ प्लेस लगे।

इससे जो सामान्य जन हैं उन्हें भी कहानी पता चलती है, और जो आलोचक हैं, समीक्षक हैं उनको भी एक मतलब पता चलता है। और ये क़तई ज़रूरी नहीं कि आपकी कहानी में डीप मीनिंग हो ही। बिलकुल नहीं। कई बार जब आप एक लव स्टोरी पर काम कर रहे होते हैं तो उसमें डीपर या दोहरी मीनिंग में क्या दिखाएँगे? ज़्यादा स्कोप नहीं होता। 

इसीलिए, ‘हटके’ और ‘कुछ नया’ करने के पीछे मत भागिए। कहानी उठाइए, कैमरा उठाइए, कम्पोज़ कीजिये कि क्या दिखाना है क्या नहीं, और फिर एक्शन कहकर कहानी कहिए। 

बाक़ी आप सब ख़ुद समझदार हैं ही। कहीं ये ना कह दीजिएगा कि आपने आजतक क्या किया है। तब हम चुप हो जाएँगे। 

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