बंदर के हाथ नारियल, केजरीवाल के हाथ ट्विटर, एक ही बात है

एक कहावत है हिन्दी में ‘बंदर के हाथ नारियल’। वैसे तो बंदरों के हाथ कुछ भी लग सकता है लेकिन नारियल थोड़ा ख़तरनाक होता है। उसको खाने के चक्कर में वो अपने दाँत तोड़ सकता है, पटक पटक फ़ील लेने के चक्कर में अपना सर फोड़ सकता है, किसी सामने वाले के सिर पर फेंक सकता है… लेकिन ये तय है कि वो उसको ठीक से खा नहीं पाएगा।

ये तो सर्वविदित है कि अरविंद केजरीवाल जी दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। ये भी सर्वविदित है कि ट्विटर का प्रयोग सबके वश की बात नहीं होती। मेरा मतलब है कि आप अकाउंट तो खोल सकते हैं लेकिन उसका करना क्या है, ये समझ में आना उतना ही कठिन है जितना एक बंदर से एक्सपेक्ट करना कि वो नारियल छीलेगा, फिर फोड़ेगा, फिर चाकू या और किसी चीज़ से फल को निकाल कर खाएगा।

वैचारिक स्तर पर वाद-विवाद, आरोप-प्रत्यारोप आदि राजनीति को ज़िंदा रखने वाले महत्वपूर्ण पहलू हैं। जहाँ ज़रूरी है वहाँ सरकारों को बिल्कुल कोसते रहना चाहिए क्योंकि हमने वोट दिया है अपनी ज़िंदगी सुधारने के लिए।

अब ये समझना बहुत ज़रूरी है कि हमारे नेता द्वारा, जिसे हम पूजते हैं (कभी भक्त तो कभी आपटार्ड बनकर), लोगों की डिग्रियाँ निकलवाने, उसकी बीवी है कि नहीं, वो जिस ई-रिक्शा पर बैठें हैं उसमें रिलायंस-ओला देखने आदि बातों से हमारी या आपकी ज़िंदगी में कोई सुधार नहीं आता।

और जनता ये बात जानती है इसीलिए कल किए गए ट्वीट पर जिसमें केजरीवाल जी ने मोदी को रिलायंस और ओला का प्रचारक बताया था, घंटे भर में बेचारे ख़ुद कम से कम पचास कंपनी के ब्राँड अंबेसेडर बना दिए गए।

ट्विटर नामक नारियल का इस्तेमाल करने के चक्कर में एक मुख्यमंत्री ट्रोल कैसे बन जाता है उसका जीता जागता उदाहरण दिल्ली के मुख्यमंत्री जी हैं। जो सवाल उन्हें उठाने चाहिए वो उठाने में उनको बहुत दिन लग जाते हैं। पूरे पेपर के अंदर के पन्नों को ख़रीदकर अपनी सरकार के बारे में लिखवाना पड़ता है क्योंकि शायद ज़मीन पर बहुत कुछ होता दिख नहीं रहा। अपने पंद्रह सौ स्केवेयर किलोमीटर के प्रदेश में हो रही शिक्षा विभाग में रिफॉर्म्स को कन्याकुमारी और बोकारो के अख़बारों में पब्लिक के पैसे के बल पर छपवाया जाता है।

मोहल्ला क्लिनिक का बहुत बवाल हो रहा है। दुर्भाग्य ये है कि मुश्किल से पाँच भी इस स्थिति में नहीं है कि उन्हें क्लिनिक कहा जाए। गिनाते हैं कि सौ खुल गए और पता चलता है कि ना तो इसके लिए कोई टेंडर पास हुआ, ना ही जगह कैसा होगा, किस तरह का डॉक्टर होगा कोई तय बात नहीं है। यहाँ तक कि आम आदमी पार्टी के नेताओं के दफ़्तरों या घरों के ऊपर ही ऐसे क्लिनिकों के बोर्ड लगे हुए हैं।

सीसीटीवी कैमरा और महिलाओं की सुरक्षा तो हर गली नुक्क्ड़ में फ़्री के वाइफाइ सिग्नल की तरह उपस्थित है ही। प्रदूषण घटाने के लिए ऑड-ईवन करते हैं, पता चलता है कि प्रदूषण उलटा बढ़ गया। हलाँकि इसमें इनका दोष नहीं है पर इसे स्वीकारने में क्या हर्ज है कि ये प्रयोग असफल है?

मतलब चाइना के अख़बार में या कोई विदेशी मैगज़ीन ने आपका नाम लिख दिया तो आपकी हर बात सही हो गई लेकिन वही विदेशी मीडिया आपके संरक्षक और पालक सोनिया माता के बारे में बताए तो आपको ट्वीट करने में भी तीन दिन लग जाते हैं। और ट्वीट में भी इतना आदर भाव झलकता है कि बाप रे बाप!

इनका पूरा काम क्या होगा ये तो पाँच साल बाद ही इवेलुएट करना चाहिए, क्योंकि वादे साल भर में पूरे ना तो होते हैं, ना किए जा सकते हैं। उम्मीद थी कि एक नए तरह की राजनीति करने आए हैं।

ये पता नहीं था की ये नई राजनीति अपने ओछे दर्जे की हरकतों को ट्विटर के ज़रिए दर्शाना है। और एक आदमी करे तब तो ठीक है, यहाँ आपके विधायक और मंत्री सब वही कर रहे हैं। कोई मोदी और आनंदीबेन के उम्र का फ़र्क़ (वो भी ग़लत) निकाल कर खीं खीं खीं कर रहा है, कोई उसकी डिग्री माँग रहा है (सोनिया-राहुल का तो नहीं माँगा कभी, अपने तोमर जी का, सोमनाथ जी का भी चेक कर लेते तो बेइज़्ज़ती नहीं होती), कभी आपको वो जिस रिक्शे पर बैठा है उसके स्टिकर में कुछ दिख जाता है…

यही आपके करप्शन की लड़ाई है? यही राजनीति करने आए हो? याद है एक बोर्ड लगवाया था कि ‘प्रधानमंत्री सर, हमें काम करने दीजिए’, यही काम कर रहे हो? जब कोई सवाल पूछे तो रोने लगते हो कि हमारे पास तो कुछ है ही नहीं।

इतना समय है तुम्हारे पास कि कुछ तो ढंग का कर लो। मोदी का तुम कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। ना ही मोदी तुम्हारा कुछ बिगाड़ पाएगा। वो भी पाँच साल के लिए तुम्हारी ही तरह चुनकर आया है। उसे तब घेरो जब उसकी कुछ ग़लती हो, वरना ये जो ट्रोलिंग कर रहे हो, उससे तुम्हारे समर्थकों को निराशा हो रही होगी।

अगर ऐसे ट्वीट से आम आदमी पार्टी के समर्थक निराश नहीं हैं तो उनको चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। अगर लगता है कि इसी तरह की राजनीति नई राजनीति है तो आईना देखना बंद कर दीजिए, क्योंकि आप अपनी सूरत बर्दाश्त नहीं कर पाओगे अगर थोड़ी भी समझ है।

मुझे दिल्ली का मुख्यमंत्री चाहिए, मुख्यमंत्री के रूप में जो कुछ कर रहा हो। मुझे ट्विटर ट्रोल नहीं चाहिए, वो बहुतेरे घूम रहे हैं। ये तो रिलायंस-ओला वाले ट्वीट के बाद आपको पता चल ही गया होगा।

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