जाधवपुर यूनिवर्सिटी के वैचारिक दोगलेपन के बीच मोलेस्टेशन का चार्ज झेलते ‘बुद्धा’

कल क्या हुआ बताता हूँ। वैसे आप भी पेपर पढ़ते होंगे। एक फ़िल्म है ‘बुद्धा इन अ ट्रैफ़िक जैम’। इसकी स्क्रीनिंग होने वाली थी जाधवपुर यूनिवर्सिटी में। वहाँ बहुत बवाल हो गया। दिखाने वाले ग्रुप के चार मेंबर को नहीं दिखाने देने वाले ग्रुप के लोगों ने बंदी बनाकर रख लिया। दिखाने वाले ग्रुप के कुछ लोगों पर ‘मोलेस्टेशन’ का चार्ज लगाया गया और फिर मारपीट हुई कि फ़िल्म नहीं दिखाने देंगे।

बता दूँ कि जाधवपुर यूनिवर्सिटी, जो शायद ही कभी किसी ढंग की बात को लेकर चर्चा में रही हो, में एक फ़िल्म और दिखाने की कोशिश हुई थी, ‘मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है’, और जब उस पर बवाल हुआ था तो तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इसे फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच और राइट टू डिसेंट पर हमला बताया था और काफ़ी डिबेट हुए थे।

आज भी एक फ़िल्म है, आज भी वही यूनिवर्सिटी है, आज भी वही दो ग्रुप हैं। लेकिन वामपंथी बुद्धिजीवी के ‘इन्टोलरेन्स’ की फूटी शहनाई से कोई भी गीत नहीं निकल रहा।

हाँ, ये बात तो सामने है कि इनका जो आदिकाल से विरोधियों को फँसाने का फ़ंडा चला आ रहा है, फ़ीमेल काडर का ‘इस्तेमाल’ करके वो अब कुछ ज़्यादा ही मेनस्ट्रीम हो गया है। ये बाबा भारती और खड्गसिंह वाला मामला हो गया है। वामपंथी विद्यार्थी पार्टियों की लड़कियों के साथ इस रेट पर ‘मोलेस्टेशन’ हो रहा है कि कोई शब्द नहीं हैं।

जेएनयू में भी हमेशा से ये ग्रुप अपने पार्टी की छात्राओं से इस तरह के आरोप अपने विरोधियों को ‘शांत’ करने के लिए लगाते रहे हैं। उन शिकायतों में ‘मोलेस्टेशन नहीं हुआ’ ये साबित करना लड़कों के ऊपर होता है। ऐसी शिकायतों का फ़ाइनल रिज़ल्ट क्या होता है कोई नहीं जानता पर विरोधी के चरित्र पर तत्काल दाग तो लग ही जाता है।

ख़ैर, ये लोग ये बात नहीं समझते कि वो अपने आपको ‘इस्तेमाल’ होने दे रही हैं उस पार्टी के नाम पर जिनके विचारधारा की प्रासंगिकता अब दुनिया में कहीं नहीं है। अपना इस तरह से ‘इस्तेमाल’ होने देना किसी भी कारण से तर्कसंगत नहीं लगता। अपने नाम में डेमोक्रेटिक डालकर ये जिस तरह की सड़ाँध फैलाते हैं, चाहे वो नक्सली नरसंहार हो या फिर वैचारिक दोगलापन, हर बार ये अपनी क़ब्र गहरी करते जा रहे हैं।

इनके मौसमी विमर्शों का शीघ्रपतन हमेशा ही दिख जाता है जब इनके मतलब की फ़िल्म नहीं दिखाने पर ये इन्टोलरेन्स राग गाते हैं, और फिर ख़ुद ही किसी दूसरे की फ़िल्म दिखाने के लिए मारपीट, बंधक बनाना और मोलेस्टेशन का चार्ज लगाने जैसी ओछी हरकत करते हैं।

आज आपको ट्विटर के पुराधाओं से इसकी भर्त्सना करती ट्वीट नहीं मिलेगी। आपको इस पर आपके पसंदीदा चैनल प्राइम टाइम में मोमबत्ती जलाते नहीं दिखेंगे। आपको इसपर फ्रंटपेज़ में राइट टू फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच एण्ड एक्सप्रेशन पर छत्तीस फोंट साइज़ में हेडलाइन नहीं दिखेगा।

और दुर्भाग्य ये भी है कि फ़र्ज़ी ही सही इंटेलेक्चुअल तो हैं वामपंथियों के पास जो इस तरह का रायता फैला लेते हैं। बाक़ी विचारधाराओं के इंटेलेक्चुअल कहाँ हैं जो इनकी बैंड बजाएँ। हमने अपनी विचारधारा ट्रोलिंग तक सीमित कर रखी है। ट्रोलिंग और ट्विटर पर विरोधियों को गाली देने में ही हमारी सारी शक्ति निकल जाती है।

ये दुर्भाग्य है कि फ़र्ज़ी विचारकों ने पूरे मीडिया पर शिकंजा कसा हुआ है और इस फ़र्ज़ीपने को काटने वाले विचारक हमारे आपके बीच बहुत कम हैं।

इस फ़र्ज़ी डिबेट को काउंटर करने के लिए एक नैरेटिव की ज़रूरत है जो इन सड़ी हुई विचारधाराओं को इनके हर ग़लती, नौटंकी की याद दिला सके। ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो इनकी नंगई और वैचारिक दोगलेपन को सामने ला सके।

अगर मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है तो बुद्धा को ट्रैफ़िक जैम से निकालना हमारा फ़र्ज़ है।

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