तृप्ति देसाई हाजी अली पर अतृप्त, पर तुम्हारी लड़ाई कौन लड़ेगा?

तृप्ति देसाई याद ही होगी। फ़ेमिनिज्म की पोस्टर लेडी जिन्होंने महिलाओं को शनि शिंगणापुर मंदिर में प्रवेश दिलवाया। कोर्ट ने भी साथ दिया और कहा कि महिलाओं का ये अधिकार है कि वो किसी भी पूजास्थल में जाएँ और सरकार का काम है उन्हें प्रोटेक्शन देना।

फ़ेसबुक पर भी दो खेमा बँट गया था एक उनका जिन्हें ना धर्म के बारे में मालूम है, ना मंदिरों के बारे में (अगले पैराग्राफ़ में लिखेंगे कि क्या मालूम नहीं है) जो समानता का परचम लिए थे, और दूसरे, इन्हें भी ज़्यादा धर्म और मंदिर मालूम नहीं, परम्परा के पक्षधर थे कि ऐसा नहीं होना चाहिए।

जो बहुत पुराने मंदिर हैं, जिनमें देवता और देवियों की प्राण प्रतिष्ठा होती है, उनका अपना स्वभाव और गुण होता है। ये आज की तरह के पार्कों में ‘उगने’ वाले मंदिर नहीं होते जो बने हैं २०१५ में और लिखा है प्राचीन शिव मंदिर। मोटे तौर पर, पुराने मंदिरों की संरचना और वास्तु में तरह तरह के वैज्ञानिक आयाम होते हैं जो वहाँ इस्तेमाल हुए पत्थर, उस जगह की भौगोलिक स्थिति, मंदिर के आकार से लेकर वहाँ किस तरह की ऊर्जा है तक से संचालित होती है। ज़्यादा डिटेल में पढ़ने की इच्छा हो तो लिंक हम कमेंट में डाल देंगे।

यही कारण है कि कहीं किसी मंदिर में औरतों का जाना निषिद्ध है, तो कहीं पुरूषों का। कहीं एक जाति-विशेष का मंदिर है तो कहीं एक वर्ग विशेष का। हर तरह के मंदिर हैं इस देश में और तरह तरह की पाबंदियाँ भी हैं जो सैकड़ों सालों से चली आ रही हैं।

ख़ैर, लेटेस्ट न्यूज़ पर आते हैं। जब शिंगणापुर में महिलाओं को शनिदेव को छूने की आज़ादी मिल गई और उसे दिलवाने के चक्कर में कितने बुद्धिजीवियों ने बवाल काटे। मुझे भी ख़ुशी हुई थी कि चलो एक परम्परा तो टूटी। जिन्हें छूना है वो जाकर छूएँ शनिदेव को। जो आस्थावान हैं और जानते हैं कि कोई कारण है तभी तो मनाही थी, वो तो वैसे भी नहीं जाएँगे, जिन्हें वैसे ही अनभिज्ञता में जाना हो, वो जाएँ।

देसाई जी की इस उपलब्धि के बाद, जिसमें धर्म की कोई बात नहीं थी, बात महिलाओं को समानता का अधिकार दिलवाने की थी, लोगों ने उन्हें मुसलमान महिलाओं के लिए हाजी अली दरगाह में प्रवेश के लिए आगे बढ़ने को कहा।

imageतृप्ति देसाई आगे बढ़ी ज़रूर लेकिन हुआ वहीं जो हमारे देश में इस्लाम से जुड़ी हर बात का होता है। कल तक जो बात महिलाओं के समानता को लेकर थी, वो अचानक से इस्लाम में दख़लंदाज़ी की हो गई। देश की मुस्लिम जनता, ख़ासकर महिलाएँ, चुप हैं। अब सर्वे तो नहीं कराया जा सकता कि कितनों को एंट्री चाहिए। और सर्वे तब भी नहीं हुआ था जब शिंगणापुर के लिए तृप्ति जी पूरे हिंदू महिला वर्ग की नेत्री बन गईं थी।

मेरा सवाल आम जनता से नहीं है। क्योंकि आम आदमी, औरत सहित, पेट भरने के चक्कर में ज़िंदगी काट देते हैं। उन्हें मूलभूत बातों से मतलब है। ना कि इससे कि वो हाजी अली जा सकती है कि नहीं। उसे इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि शणि शिंगणापुर के काले पत्थर पर तेल चढ़ा सकती हैं कि नहीं। एक आम महिला वहाँ तक जाएगी भी नहीं।

मेरा सवाल उनसे है जो महिला समानता की बात वहीं तक करते हैं जहाँ तक कन्विनिएंट हो। या फिर वो ये बता दें कि महिला समानता और फ़ेमिनिज्म धर्म पर आश्रित है। क्या ये सच है कि महिलाओं को समानता कि गुँजाइश सिर्फ हिन्दुओं में ही है? या फिर मुसलमान महिलाओं को समानता की ज़रूरत नहीं है? क्योंकि मैंने देखा है कि महिलाएँ, दोनो ही धर्म में किस पायदान पर घिसट रही हैं।

इस हाजी अली वाले प्रकरण से तृप्ति देसाई ने अपना नाम और समर्थन वापस ले लिया है। उसके साथ कोई भी फ़ेमिनिस्ट नहीं है। उसके साथ मेरे वो मुसलमान दोस्त भी नहीं जो फ़ेसबुक पर बड़े चाव से शनि मंदिर वाली ख़बर शेयर कर रहे थे।

एक दरगाह में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है इस्लाम में, ये बात मुझे पता है। यही बात चीख़ चीख़ कर कुछ लोग शनि मंदिर के बारे में भी कह रहे थे कि वहाँ भी महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। एक बात धार्मिक और आपके ‘पर्सनल लॉ’ से संबंधित हो जाती है और दूसरी रिग्रेसिव और अनसाइंटिफिक?

छद्म-नारीवादियों का ये दोहरापन हेडलाइन में एक इस्लामिक शब्द के आते ही प्रत्यक्ष हो जाता है। जहाँ हाजी अली में अली दिखा, ‘वो तो उनका अपना विषय है’ लेकिन जहाँ मंदिर दिखा कि वो अंतरराष्ट्रीय मुद्दा हो जाता है कि देखो भाई भारत में हिंदू महिलाओं को मंदिर में नहीं घुसने दिया जाता।

दुःख यही है कि महिलाओं को कहीं भी घुसने नहीं दिया जाता। महिलाओं को ख़ुद के लिए हर जगह, हर समय, हर परिस्थिति में लड़कर जगह बनानी पड़ी है। अच्छी बात ये है कि दस महिलाओं ने हिन्दू महिलाओं के लिए लड़ाई तो लड़ी, तुम्हारी लड़ाई कौन लड़ेगा? तुम्हें तीन तलाक़ो से निजात कौन दिलाएगा? तुम्हें पुरानी मस्जिदों में कौन पहुँचाएगा? तुम्हें किसी की चौथी विवाहिता होने से कौन बचाएगा? तुम्हे गणित और विज्ञान को शैतानी बताने वाले मुल्लों से कौन बचाएगा?

ये ना कहना कि ऐसा नहीं है, वरना अपनी आँख पर से मेरा विश्वास उठ जाएगा।

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