बिहार के ‘ख़ूनी’ बहार में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या

हिन्दुस्तान के एक ब्यूरो चीफ़ की आज बिहार में हत्या कर दी गई। नाम महत्वपूर्ण नहीं है फिर भी रिकॉर्ड के लिए बता देता हूँ कि राजदेव रंजन है। नाम महत्वपूर्ण इसलिए नहीं है क्योंकि ये एक पत्रकार की हत्या है। पत्रकार ख़ुद मर जाए तो ठीक है, पर पत्रकार की हत्या हो जाना एक प्रतीक है।

बात ये नहीं है कि पत्रकारिता का स्तर कितना गिर गया है, वो तो गर्त में है। लेकिन एक पत्रकार को मार देना एक सरकार के संरक्षण में पल रहे रंगबाजों और गैंग्सटर नेताओं के छुटभैये चमचों की हिमाक़त के बारे में बहुत कुछ कहता है। ये राज्य बिहार है, जहाँ आया बहार है।

नितीश कुमार का नारा था कि ‘बिहार में बहार हो, नितीसे कुमार हो’। बहार तो है लेकिन किसके लिए ये जानना लाज़मी है। या शायद नहीं। कुछ दिन पहले एक विधायक पुत्र ने अपनी गाड़ी को ओवरटेक करने वाले एक छात्र को गोली मार दी। ग़ौरतलब से है कि श्रीमान् रॉकी यादव ने गोली ‘दिल्ली’ से चलाई थी और युवक को बिहार में लगी। ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि रॉकी जी ने कहा कि वो हादसे के वक़्त दिल्ली में थे।

ख़ैर सलमान की कार तो गूगल कार थी। तो हो सकता है रॉकी भी दिल्ली में होंगे और राजदेव जी ने कहीं रिवाल्वर बाँध दिया हो, और चलने को हुए हों तो ट्रिगर बँधे होने के कारण खिंच गया हो और उनकी मौत हो गई हो। ये लॉजिक ही सही है क्योंकि बिहार में तो बहार है और जो है सो नितीसे कुमार है!

रॉकी को दिल्ली पुलिस ने लाइसेंस दिया था तो बिहार के तेजस्वी उपमुख्यमंत्री के हिसाब से बिहार सरकार का कोई ज़िम्मा नहीं है। जिनके नाम में ही तेज हो, वो भला ग़लत कैसे होंगे। और तो और उपमुख्यमंत्री भी हैं। तो ग़लत होने की गुँजाइश खत्म हो जाती है।

दिल्ली पुलिस जब जब, जिस जिस को लाइसेंस दे उसके साथ एक कॉन्स्टेबल चलता रहना चाहिए ताकि ग़लत उपयोग ना हो। और कुछ ऐसा उपाय भी होना चाहिए कि रॉकी जैसे महान लोगों की गोली अगर दिल्ली से चले तो दिल्ली में ही रहे, बिहार के आदित्य को ना जा लगे। ये बात भी पता करनी चाहिए कि राजदेव के हत्यारों को लाइसेंस किसने दिया। ये पता लग जाए तो ब्लेम फ़िक्स करके रामधुनी रमाइ जाएगी।

पत्रकार की मौत पर कोई सवाल-ववाल नहीं उठता क्योंकि बिहार में बहार है। बहार के आने का स्वागत ही रंग-बिरंगे फूलों से होता है, अब फूल नहीं है तो दो चार लीटर ख़ून बह ही गया तो क्या हो गया। ये बेग़ैरत पत्रकार अपने राज्य के लिए दो लीटर ख़ून नहीं दे सकते!

सब ठीक है। बिहार बहुत सही जा रहा है। सरकार बनने से लेकर अभी तक हजार लोग भी रंगबाजों की गोली से नहीं मरे हैं। ये एक उपलब्धि है। ज़ी न्यूज़ की एक ख़बर के अनुसार जनवरी तीन तक कुल 578 मर्डर ही हो पाए बिहार सरकार के दो महीने में। मैं इसकी कड़े शब्दों में भर्त्सना करता हूँ।

वैसे भी गर्मी का मौसम है, दिमाग़ी पारा ऊपर ही रहता है अब ऐसे में एकाध लोग हर चार घंटे पर मार ही दिए जाएँ तो क्या दिक़्क़त है। देश का पॉपुलेशन कितना बढ़ गया है कुछ मालूम भी है कि मोदी जी के सवा सौ करोड़ भारतवासी के बाद पैदा होना बंद हो गए? बहार को आने दीजिए। बहार आने से जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगता है।

बहार के आने के लिए एकाध हजार बलियाँ चढ़ भी जाएँ तो लार्जर पिक्चर को देखते हुए ये सब जायज़ है। बहार आना ज़रूरी है, लोग तो फिर से पैदा हो जाएँगे।

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