असम में भाजपा की सरकार और बुद्धिजीवियों का कोरस में विधवा-विलाप

असम में भाजपा का आना लगभग तय है। इंडिपेंडेंट रिपब्लिक ऑफ़ फ़ेसबुक के कुछ बुद्धिजीवी लोग चूड़ियाँ तोड़ रहे हैं अपने स्टेटस में। ये लोग वही हैं जिन्होनें दो साल पहले भाजपा के केंद्र में आने पर अपनी बातों से ऐसा माहौल बना दिया था कि मुसलमानों को भगा दिया जाएगा देश से, मस्जिदें तोड़ दी जाएँगे, ‘भगवा आतंकवादी’ (जिसका कच्चा चिट्ठा अब सामने है) सड़कों पर नंगी तलवारें लिए घूमेंगे।

हलाँकि ऐसा नहीं हुआ। देश चल रहा है, और इन्टॉलरेन्स, अभिव्यक्ति की आज़ादी के तमाम रागों के बीच काँग्रेस के समय से काफ़ी बेहतर स्थिति में है। नार्थ इस्ट के राज्यों को जहाँ तमाम सरकारें जानबूझकर सड़क, रेल, बिजली आदि से दूर रखती रही, वहाँ बेहतरी की शुरूआत केंद्र ने सत्ता में आते ही कर दी थी। और शायद उसी का नतीजा है कि असम के लोगों में इस पार्टी को अपना समर्थन दिया है।

आप के पसंदीदा पार्टी की सरकार जनता की चुनी हुई है, लेकिन भाजपा की सरकार आ गई तो आपको लगता है कि लोकतंत्र की हत्या हो गई है! आप की पसंदीदा सरकारों के दिये वादे किस तरह पूरे हो रहे हैं वो सबको पता है, लेकिन आपने भाजपा की सरकार को असम में आने से पहले ही जज कर लिया और चूड़ियाँ तोड़ लीं!

आपने लालू के बिहार में आने को लोकतंत्र और संविधान की जीत बताई थी। आपने बिहार में लौटे गुंडागर्दी और हत्या के सुनियोजित अपराधतंत्र को ये कह कर नकार दिया कि कहाँ नहीं हो रहा है। तो फिर यहाँ भाजपा के सरकार आने से आपको इतनी दिक़्क़त क्यों है?

लगता है आपकी फ़ंडिंग पर दिनों दिन शिकंजा कसता जा रहा है। आपके ख़ुद को इंटेलेक्चुअल कहलाने के लिए बस अब भाजपा-बैशिंग ही रह गया है। अब आप सिर्फ अपनी घृणा दिखाते हैं, उसको लॉजिक से जस्टिफाय़ भी नहीं कर पाते। आपने ये सोच लिया है कि भाजपा आएगी तो सिर्फ बुरा ही होगा या आप वैसा माहौल बना देंगे। यही कारण है कि जेएनयू के चारों देश-विरोधी नारों वाले वीडियो को पहले तो उसे ‘डिस्सेंट’ का पैजामा पहनाया, फिर उसे नक़ली कहकर नकार दिया था, लेकिन अब जबकि सबूत सामने है तो आप उस पर बात नहीं करेंगे।

आप इस पर भी बात नहीं करेंगे कि क्यों विश्वविद्यालय में एक फ़िल्म के विरोध में उतरी एक पार्टी को आप संवैधानिक व्यवस्था और अभिव्यक्ति की हत्या बता देतें है लेकिन दूसरे फ़िल्म का विरोध करने में इतने आगे बढ़ जाते हैं कि डायरेक्टर की गाड़ी तोड़कर, विपक्षी पार्टी के छात्रों को बंधक बनाकर रखते हैं और फिर उन पर मोलेस्टेशन का चार्ज लगा देते हैं।

आपका ‘इंटेलेक्ट’ अब बस ‘मोलेस्ट’ होने के लिए ही बचा है। आपका सारा ज्ञान अब किसी तरह कुछ भी सरकार विरोधी बोलकर दाँत निपोड़ कर हँस लेना है। और अपने कन्विनिएंट समय तथा लॉजिक के अनुसार जादवपुर, एसएफआई के विद्यार्थी नेता द्वारा किए ख़ुलासे आदि को बिल्कुल भी ध्यान ना देकर कुछ और बात छेड़ देनी है।

आपका ये ब्लफ पकड़ा जा चुका है। आपकी हाँ में हाँ मिलाने वाले अब कम हो रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं इस कन्विनिएंस का राज। और वो दिख रहा है कि लोग सरकारें चुन रहे हैं।

ट्विटर पर अपनी छद्मबुद्धिजीविता ट्रेंड कराकर आप पचास हजार लोगों को ही मूर्ख बना सकते हैं। प्राइमटाइम में पत्रकारिता छोड़कर फ़ंडिंग देने वाले आकाओं का एजेंडा दस लाख लोगों तक ही पहुँच सकता है। आपके बिकी हुई ज्ञान की धारा जिन पेपरों में छपती है उसकी पहुँच आप ही के चमचों तक है। आम आदमी को जहाँ विश्वास दिखता है, वहाँ वोट देती है। आम आदमी ठगे जाने पर बदला ले लेगा।

आपको अपनी चूड़ियाँ तोड़कर किसी राज्य के वोटरों की समझ पर रोने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि बात ये है मोहतरम! कि आम आदमी ना तो ट्विटर पर है, ना ही अंग्रेज़ी का प्राइमटाइम देखता है।

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