एंटर-मार फेसबुकिया कविताओं को बढ़ावा देना बंद कीजिए

हिन्दी की सारी विधाओं में जिसका पतन सबसे ज़्यादा हुआ है, वो है कविता। कविता का हाल हिन्दी संगीत में इन्फैक्शन जैसे फैलते बेहूदे ‘रैप’ जैसा हो गया है। कुछ भी उलूल-जुलूल लिख कर, जहाँ तहाँ एंटर मारकर लोग कवि-कवयित्री बन रहे हैं।

सबसे भयावह स्थिति एक ख़राब कविता नहीं है। सबसे भयावह बात है उस कवि-कवयित्री को प्रोत्साहन देना। आप तो मित्रप्रेम से ग्रसित होकर एक बेहद ही घटिया दर्जे की कविता को ‘ऑस्सम’, ‘ब्यूटिफुल’ लिख कर निकल लेंगे, वो कवि-कवयित्री गंद मचाते रहेंगे।

फिर हिन्दी का वही हाल होगा जो भोजपुरी का हो गया है। भोजपुरी के घटिया गानों को जिस तरह से हर शादी में, हर उत्सव में बजाकर नाचा गया, और जिस तरह की गंद मचाने की छूट दी गई उसमें उम्दा लिखने वाले ग़ायब हो गए। आज भोजपुरी का मतलब ‘कुछ गंदा’ हो गया है। जबकि बहुत ही समृद्ध भाषा (या बोली) है और बेहतरीन कविताएँ, नाटक, लोकगीत लिखे गए हैं। लेकिन आज किसी को कहिए, “भोजपुरी गीत सुनोगे?” तो आपकी ओर ऐसे देखेगा मानो आपने उससे पब्लिकली पॉर्न देखने कह दिया हो।

अगर आप इन घटिया कवियों को प्रोत्साहन देते रहेंगे तो हिंदी कविता का मतलब छोटी-बड़ी लाइनें हो जाएँगी जिसमें आपको चाँद, ओस की बूँद, बारिश, घास, आँखें, होंठ का हिलना आदि चालीस-पचास चिरपरिचित शब्दों के झुंड के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

कविता में शब्द का बहुत ज़्यादा महत्व नहीं होता। शब्द सिर्फ एक ज़रिया हैं। कविता में भाव प्रबल होता है। कोई पढ़े तो फ़ील करे, ये नहीं कि कहने लगे वाह! क्या शब्द इस्तेमाल किए हैं। चॉकलेट का रैपर कितना ही अच्छा रहे, स्वाद चॉकलेट में होता है।

कविता आप आँख मूँदकर सुनें तो आपको छूनी चाहिए। उसके सारे भाव आपके हो जाने चाहिए। कविता एकदम से साधारण शब्दों में भी लिखी जाती है और सुसज्जित शब्दों में भी बिंब लिए। लेकिन भाव किसी बिम्ब का मोहताज नहीं होते। भाव गीत बनकर निकलते हैं, भाव कहानी की अंतिम पंक्ति बनकर निकलता है, भाव नाटक में नायक के संवाद के साथ निकलता है…

भाव एंटर मारे पंक्तियों से भी निकल सकता है लेकिन हर एंटर मारी पंक्तियों में भाव हो, ज़रूरी नहीं। इसको बढ़ावा मत दीजिए। किसी की वॉल पर बुरा नहीं लिखना चाहते तो इग्नोर कीजिए। ऐसी कविता को आगे बढ़ाएँगे तो भगवान ही मालिक है।

ये हमारे पर भी लागू होती है। हमारी कविता भी घटिया हो सकती है। वहीं पर कह दीजिए कि घटिया है। आप घटिया कहेंगे तो मैं बेहतरी की तरफ़ बढ़ूँगा। ज़ाहिर है हर आदमी की हर कविता अच्छी नहीं होती, लेकिन एक आदमी उसको सुधारने की कोशिश करेगा और दूसरा एंटर मारकर शेयर करता रहेगा।

शुगरकोटिंग करते रहिएगा तो लोग बेनेफिट ऑफ़ डाउट ख़ुद को देकर ये सोच लेंगे कि कविता अच्छी है। हिन्दी को बचाइए। वस्तुतः किसी भी भाषा में अगर कोई ऐसा कर रहा हो तो दबोचिए वहीं। ऐसे कुकुरमुत्ते ज़हरीले होते हैं। इन पर एसिड डाल दीजिए।

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