सरकारों का जश्नी विज्ञापण ब्लिट्ज़क्रेग कहाँ तक उचित है?

गुरूवार को मोदी सरकार के दो साल होने के उपलक्ष्य में ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’ हो गया। तमाम अख़बारों में मोदी जी की तस्वीरें और उनकी सरकार की सफल योजनाओं का ब्योरा था। सरकारों का विज्ञापण देना कोई नई बात नहीं है। काँग्रेस काल में हमने और आपने देखा है कि बत्तीस पेज के अखबार में कम से कम अठारह पेज पर नेहरू, इंदिरा या राजीव जी की जयंती या श्रद्धांजलि कैसे आती थी।

और हाँ जब विज्ञापण की बात हो ही रही है तो ‘नई राजनीति’ के पुरोधा अरविंद केजरीवाल जी के बारे में नहीं भी लिखा जाय तो पता चल ही जाएगा कि किस तरह से ब्लदिमिर पुतिन को भी पता होता है कि नई दिल्ली के मल्होत्रा जी के घर के आगे पड़े कूड़े को आम आदमी पार्टी की सरकार ने हटवा दिया है, क्योंकि ये विज्ञापण मॉस्को की अख़बार में भी होता है।

ख़ैर, इन विज्ञापणों पर पैसा किसका जाता है और क्या यह जायज़ है, ये बहुत बड़ा सवाल है। क्या दो साल की उपलब्धियाँ गिनाने की ज़रूरत सरकार को है जबकि मीडिया युग में आपकी बड़ाई और बुराई, समान रूप से, करने वाले मीडिया चैनल, अखबारादि प्रचूर मात्रा में उपलब्ध हैं। ऑड-इवन से पॉल्युशन कम हुआ या नहीं, ये जाने बग़ैर दिल्ली जैसी छोटी जगह के बारे में भारत के हर समाचार पत्र में विज्ञापण आना किस तरह की ‘नई राजनीति’ है, ये किसी को पता नहीं चला है।

मीडिया चैनलों की सामग्रीहीनता के दौर में सरकारों को विज्ञापण देने की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर आप सब अपने शहरों को, गाँवों को याद करेंगे तो आप पाएँगे कि सरकार की योजनाओं की जानकारी बड़े बड़े पीले रंग के बोर्ड पर लिखी होती है। सदर अस्पताल के बाहर, थाने के बाहर, पंचायत भवन पर, मुखिया के कार्यालय पर, नगर निगम कार्यालय के पास तथा लगभग हर पब्लिक प्लेस पर सरकारी योजनाओं के बारे में बड़े-बड़े और मोटे अक्षरों में लिखा होता है।

अगर आप कोई काम अच्छा करेंगे तो मीडिया वह दिखाएगी। सोशल मीडिया के दौर में सुरेश प्रभु के काम के बारे में आपको पेपर में छापने की ज़रूरत नहीं है। उनके काम की सराहना ट्विटर और फ़ेसबुक पर इतनी हो रही है कि वो अपने आप टीवी और पेपर में पहुँच रहे हैं। पीयूष गोयल, गडकरी आदि के काम के बारे में आए दिन खोजी पत्रकार लिखते रहते हैं।

सरकार हमेशा पब्लिक डोमेन में है, उसके काम की जानकारी भी अब उपलब्ध है तो उसके ऊपर मोदी जी का ये ख़र्चा हमारी समझ में नहीं आया। पैसा तो हमारा या आपका ही है। सरकारें अपनी चार सौ प्रतिशत बढ़ी सेलरी से ना तो यूपी के मुसलमान सैनिक को दिल्लीवाला बताकर मुआवज़ा देती है, ना ही पार्टी सांसदों से चंदा करके करोड़ों के विज्ञापण का ख़र्चा।

दूरदर्शन, रेडियो पर तो हमेशा सरकारी योजनाओं की जानकारी मिलती रहती है। विकास तो एक सतत कार्य है, वो होता रहेगा। उसके बारे में लोग बातें करते रहेंगे। सरकार को अपनी बात पहुँचाने की ज़रूरत ज़रूर है लेकिन इस तरह से विज्ञापण का ब्लिट्ज़क्रेग हमें समझ में नहीं आता। काँग्रेस के पास तो ख़ैर नेहरू-इंदिरा-राजीव के अलावा कभी कुछ दिखाने को तो वैसे भी नहीं रहा, पर आप तो उनसे अलग काम कर रहे हैं, आपको शायद इस जश्न की ज़रूरत नहीं थी।

और राजनैतिक दृष्टकोण से भी देखा जाय तो चौथे साल में ये जश्न मनाना बेहतर होता, जब आपकी कई योजनाएँ फलीभूत होकर आम आदमी के जीवन में बदलाव ला रही होती। बदलाव तो अभी भी ला रही हैं, पर अभी उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं पाया है। क्या प्रोजेक्टेड है, कितना हो गया, ये सब तो बेकार बैठे पत्रकार भी ढूँढ लाएँगे।

अभी इस सरकार की शुरुआत है। अभी कई पैमानों पर खड़ा उतरना है। हो सकता है कि आपने जो साठ सालों में नहीं हुआ वो दो सालों में कर दिया हो पर साथ ही ये भी तो ज़रूरी नहीं कि हमें इतने पर ही जश्न मनाने की छूट मिल गई हो।

हर गाँव के सबसे ग़रीब घर की माँ को जब बिना कंकड़ के गेहूँ-चावल, हर महीने, उचित मात्रा में मिले, जिसे खाकर उसका बच्चा सरकारी स्कूल में एक अच्छी शिक्षा पाए और पास के अस्पताल में बुखार होने पर दवा पा ले, और ज़िंदा रहे, तब आपकी या कोई भी सरकार सफल मानी जाएगी।

और ये कहना बिल्कुल ग़लत है कि यूनियन टैरिटरी दिल्ली के मुख्यमंत्री ने तो साल भर में डेढ़ सौ करोड़ का विज्ञापण दिया, तो हम तो पूरे देश के हैं फिर हम हजार करोड़ क्यों ना ख़र्च करें! क्योंकि फिर आपमें, और ‘नई राजनीति’ करने वालों में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं रह जाएगा। किसी एक ग़लती को ये कहकर कि ‘उसने भी तो वैसा किया’, सही नहीं ठहराया जा सकता।

क्या हुआ, क्या हो जाएगा ये बातें अभी अख़बारों में है। जितना हुआ और जो हो रहा है, बिल्कुल सराहनीय है और एक सरकार से अपेक्षित भी। लेकिन सफलता का अख़बारों से ज़्यादा ज़मीन पर उतरने की ज़रूरत है और जब ऐसा हो जाए तब सरकार की जगह हम और आप अपने पैसे ख़र्च करके जश्न मनाएँगे। तब हमारी-आपकी बेहतर ज़िंदगी की बात बिना अख़बार में करोड़ों ख़र्च किए भी ब्लादिमिर पुतिन और ओबामा तक पहुँच जाएगी।

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