तन्मय भाट की कॉमेडी का स्तर ‘घटिया’ होने पर ही खत्म हो जाता है

शाब्दिक पोर्नोग्राफ़ी को कॉमेडी के नाम पर पास करने वाले AIB Roast के तन्मय भाट जी फिर से चर्चा में हैं। चर्चा का कारण पिछले बार की तरह ही एक घटिया वीडियो को कॉमेडी के नाम पर परोसना है। पिछले बार ही की तरह दो खेमे बँटे हुए हैं।

एक कह रहा है कि आप इसे ‘नॉट फनी, क्रास, बैड, डिस्गस्टिंग’ कह सकते हैं लेकिन ये कहना गलत है कि कोई किसी भी व्यक्ति विशेष का मज़ाक़ नहीं उड़ा सकता। दूसरे का कहना है कि ये कॉमेडी है ही नहीं तो फिर उस पर प्रतिक्रिया कैसी। ये बेहूदगी है जिसमें आपने देश के वैसे दो लोगों का भद्दे तरीक़े से, उनके चेहरे, उनकी उम्र आदि को लेकर मज़ाक़ उड़ाया है जिनका किसी भी तरह के निचले स्तर के काम से कोई वास्ता नहीं रहा। दोनों को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मिला हुआ है।

मेरा भी एक पक्ष है और वो है दूसरा वाला। आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहाँ खत्म हो जाती है जहाँ दूसरे के उसी मौलिक अधिकार का हनन करते हैं। ये कहकर तन्मय को डिफ़ेंड करना कि ये उसकी ‘कॉमेडी प्रोफेशन’ की अभिव्यक्ति है कि वो किसी का भी मज़ाक़ उड़ा सकता है, ये नकारा सा तर्क है जो बताता है कि आपके पास और कोई तर्क नहीं है।

मैं अगर ये कह दूँ कि ‘तन्मय भाट तुम्हारा चेहरा इतना बुरा है कि लगता है तुम्हारे पापा नाली का पानी पीकर तुम्हारी माँ के साथ सोए होंगे, उनको स्खलन से पहले अपना लिंग तुम्हारी माँ की योनि से बाहर निकाल लेना चाहिए था’ तो ये कॉमेडी नहीं है। ये बेहूदगी और एकदम घटिया दर्जे की अभिव्यक्ति है क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरे लिखने पर कोई तन्मय मुझ पर केस नहीं करेगा। करेगा भी तो मैं ‘विक्टिम आर्टिस्ट’ बनकर इन्टॉलरेन्स का सहारा ले लूँगा।

मैं ऊपर के लिखे शब्दों से तन्मय को कम और उनके माता पिता को बिना जाने भद्दे सी गाली दे रहा हूँ। ये किस तरह से कॉमेडी है, मुझे समझ में नहीं आती। कॉमेडी मैंने भी की है, और आज भी करता हूँ। लेकिन अगर मेरी सारी कॉमेडी पर्सनल अटैक करके, ‘कन्ट, डिक, फक, कॉक, पुस्सी’ कहकर हँसी ला रही हो तो मुझे अपना प्रोफ़ेशन बदल लेना चाहिए।

तन्मय और उनके ग्रुप को, कहा जा रहा है है कि स्नैपचैट वालों ने अपने फ़ेस-स्वैप फ़ीचर के लिए कुछ बनाने कहा था ताकि वो पॉपुलर हो। इसमें कितनी सच्चाई है वो मैं नहीं जानता। इन्टरनेट पर एक विडियो प्रोवाइडर बनकर मुफ़्त में कंटेंट देना बहुत मुश्किल है, तो हो सकता है कि स्नैपचैट के साथ उनकी डील हुई भी हो। ये डील कहीं से भी ग़लत नहीं है। सबको अपने प्रोफ़ेशन से पैसे कमाने का हक़ है।

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लेकिन बात ये है कि आपने कॉमेडी के नाम पर बनाया क्या? तन्मय के चेहरे से भी बुरी उसकी कॉमेडी है। उसके चेहरे और भद्दे शरीर से बुरा और कुछ हो सकता है इस ब्रह्मांड में, ये विश्वास करना मुश्किल है। पर नहीं, तन्मय की कॉमेडी उसके चेहरे और कुढब शरीर से भी घटिया है। तन्मय का चेहरा इतना खराब है कि उसके पैदा होते ही, कहते हैं कि डॉक्टर ने उसकी माँ को थप्पड़ मार दिया था!

ऊपर लिखी बातें भी बहुत ही घटिया, बेहूदगी और भद्दी बातें हैं। तन्मय भाट यही करते हैं। मैं जानता हूँ कि किसी के मोटे होने पर या चेहरा एक तरह का होने पर कोई हँसने की बात नहीं। मैं ये भी जानता हूँ कि तन्मय के तन्मय जैसा दिखने में उस बेचारे का कोई हाथ नहीं होगा। हो सकता है ये एक मेडिकल कंडीशन हो। लेकिन अब कोई उसपर चुटकुले बनाए तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा। क्योंकि किसी पर पर्सनल अटैक करना कॉमेडी नहीं, दंडयोग्य अपराध है।

ऊपर तन्मय या उनके माता-पिता पर कही सारी बातों के लिए मैं माफ़ी माँगता हूँ और ये कहना चाहूँगा कि मेरा मतलब बस उन्हीं की बात में उन्हें लता-सचिन और रोस्ट वाले एपिसोड पर ये बताना था कि कॉमेडियन के मुँह से निकली हर बात कॉमेडी नहीं होती, ना ही उनकी हर रचना को डिफ़ेंड किया जाना चाहिए। उन्होंने तो कई और भी विडियो बनाए, और पर बवाल क्यों नहीं हुआ?

जब तक आपको संविधान आपको अभिव्यक्ति की संपूर्ण स्वतंत्रता नहीं दे देता, आपको इसी देश के क़ानून के हिसाब से चलना होगा। और मुझे लगता है कि अभी जितनी स्वतंत्रता है, उतनी काफ़ी है। ज़्यादा देने ये अराजकता आ जाएगी।

शायद लोगों को तन्मय भाट का ईसाईयों और चर्च से माफ़ी माँगना याद होगा। मज़ाक़ तो उन्होंने हर धर्म का उड़ाया है, लेकिन ईसाईयों से माफ़ी माँगनी पड़ गई। उस वक़्त उनका फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन और कॉमेडियन वाला लाइसेंस कहाँ गया था?

कॉमेडी एक कला है। मैंने कई रोस्ट आर्टिस्ट भी देखे-सुने हैं, कई कॉमेडियन को भी देखा है जो कि हमसे ज़्यादा छूट वाले समाज में रहते हैं। कभी भी डॉन रिकल्स को ‘फक, कन्ट, डिक, शिट’ का सहारा लेते नहीं देखा। रोस्ट का बादशाह माना जाता है उनको। तन्मय और उनके सपोर्टर्स को डॉन रिकल्स को तो ज़रूर सुनना चाहिए। इनसल्ट कॉमेडी ही उनका सबसे बड़ा हथियार था। लेकिन वो इन्सल्ट ऐसी होती थी कि भरी सभा में अगर उन्होंने आपका मज़ाक़ नहीं उड़ाया तो आप को बुरा लग जाएगा।

कला का उद्देश्य समाज का बौद्धिक विकास होता है। कॉमेडी से लोगों को ख़ुशी और हँसी मिलनी चाहिए। कॉमेडी की परिभाषा ही वही है। तन्मय या किसी को भी ‘एनी पब्लिसिटी इज़ गुड पब्लिसिटी’ वाले मुहावरे से दूर हट कर सोचना चाहिए कि वो अपने लिए कुछ भी कर रहे हों पर जिस कला की आड़ में विक्टिमहुड के गीत गा रहे हैं, उसके संवर्धन के लिए उन्होंने क्या किया है।

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