तन्मय, आइ एम अ फ़ैन एण्ड वान्ट टू फ़क यॉर… बट हे! ऑल इन गुड ह्यूमर

जो लोग सोच रहे हैं कि तन्मय भट्ट के विडियो पर चल रहा बवाल दो ‘आइकॉन’ के मज़ाक़ उड़ाने पर है तो वो लोग चूतिये हैं। जी, चूतिये और वो भी आले दर्जे के। कैसे, वो भी बताते हैं। पिछली बार गाली-गलौज को कॉमेडी बनाकर जब परोसा गया था तो उसमें कोई भी आइकॉन नहीं था। वहाँ भी पूरा बवाल उनके ‘कन्टेंट’ पर था, कॉमेडी एज़ एन आर्ट फ़ॉर्म पर नहीं।

चलिए पहले आपको फ़ॉर्म और कंटेंट का अंतर बता देते हैं। फ़ॉर्म का मतलब है कि आप अपनी बात (कंटेंट) को रखने के लिए किस तरह के माध्यम का इस्तेमाल करते हैं। और कंटेंट है आपकी बात, आपका एक्सप्रेशन जो लोगों तक एक फ़ॉर्म के ज़रिए पहुँच रहा है।

तन्मय के फ़ॉर्म में कोई गड़बड़ी नहीं है। कॉमेडी बहुत लोग कर रहे हैं और बहुत लोग करते रहेंगे। कॉमेडी का उद्देश्य हँसाना होता है। अगर वो हँसा नहीं रहा फिर भी ठीक है क्योंकि बैट्समैन का काम रन मारना होता है और ज़रूरी नहीं की वो हर मैच में रन मारे। फिर दिक़्क़त कहाँ हैं?

दिक़्क़त तब है जब आपकी कॉमेडी से हँसी तो नहीं ही आती, उसपर ये कि आप किसी औरत के चेहरे, किसी की उम्र को लेकर उन शब्दों में मज़ाक़ उड़ाते हैं जिसकी एक सभ्य समाज में जगह नहीं। इसको हिटिंग बिलो द बेल्ट कहते हैं। ये हर जगह हो रहा है। हम-आप रोज़ ही किसी को माँ-बहन की गाली फ़्री में देते रहते हैं। लेकिन आप गाली देते हैं तो आप ये नहीं कह सकते हैं कि आप कॉमेडी कर रहे थे।

मैं किसी को गाली तभी दूँगा जब किसी ने मेरा कुछ बिगाड़ा हो। चाहे वो कोई राजनेता हो जिसने कोई वादा किया और नहीं निभाया, चाहे वो दोस्त जो मेरे साथ बदतमीज़ी करे। लेकिन मैं गाली देते वक़्त ये जानता हूँ कि मैं गाली दे रहा हूँ। मैं ये नहीं कह सकता कि ‘अरे! मैं तो मज़ाक़ कर रहा था जब मैंने तुम्हें माँ-बहन की गाली दी थी।’

तन्मय अगर ये कहे कि मैं इन दोनों को किसी कारण से गाली दे रहा हूँ तो मुझे कोई दिक़्क़त नहीं होगी। लेकिन वो कहता है कि मैं इनका बहुत बड़ा फ़ैन हूँ। ये तो वही बात हो गई कि मैं तन्मय से हाथ मिलाकर ये कहूँ कि ‘मैं तुम्हारा बहुत बड़ा फ़ैन हूँ। और हाँ, तुम्हारे माँ की …!’ फिर हम दोनों ‘हें हें हें’ करते रहें और मैं ये कहूँ, “नाइस कॉमेडी ब्रो, बाइ द वे आइ वान्ट टू फक यॉर सिस्टर, ऑर मेबी नॉट। शी माइट बी एज़ अग्ली एज़ यू!’ ऑल इन गुड ह्यूमर, तन्मय!

कॉलेज में मेरा एक क्लासमेट था। नाम नहीं लिखूँगा क्योंकि ऐसे लोग हर क्लास में आपको मिल जाएँगे। वो अपने दोस्त से कुछ यूँ मिलता था, “व्हेयर द हेल वर यू? फ़किंग यॉर मदर्स कैटफिश स्मेलिंग कन्ट?” और दोस्त का जवाब होता था, “एक्चुअली, इट वॉज़ यॉर मॉम्स शेव्ड पुसी।” और फिर दोनों हँसते थे। जब मैं किरोड़ीमल में अंग्रेज़ी पढ़ रहा था तब की बात है। उसके बाद मैं एक जगह पढ़ा रहा था तो मुझे ऐसे कई विद्यार्थी मिले जो यही भाषा बोलते थे। ये कॉमेडी नहीं है, ये मज़ाक़ भी नहीं है।

आप इसी को बढ़ावा देते रहिए और फिर आपको पता चलेगा कि आपके दोस्त ने शायद आपकी माँ का बलात्कार कर दिया। जो आप सोचते और बोलते हैं, ये एक पर्वर्टेड रिप्रेशन है। इसे आप एक समय और एक स्तर तक ही दबाकर रख पाएँगे, लिमिट क्रॉस करने पर वो कहीं ना कहीं निकलेगा ज़रूर।

ये अपने ट्विटर हैंडल से दिन भर टट्टी करता रहता है। पारसी लड़कियों को कहता है कि थोड़ा ‘स्लट इट अप’ करें और लोगों के साथ थोड़ा ‘फ़किंग’ कर लें। ये कॉमेडी कैसे है? ये एक ट्वीट है। ये कॉमेडी नहीं है। एक नवजात बच्ची को नग्न देखकर ये कहना कि ‘मैंने तो इसके बूब्स देख लिए’, किस तरह से कॉमेडी है? स्मार्टफोन के ज़रिए इंटरनेट हर स्कूली बच्चे के हाथ में है आज। आप आनेवाले कॉमेडियन तक कैसी राह पहुँचा रहे हैं, वो देख लीजिए।

कुछ ज्ञानी और छद्म-बुद्धिजीवी लोग ये भी कह रहे हैं कि हम एक समाज के तौर पर ‘ख़ुद पर हँसना नहीं जानते’। ख़ुद पर हँसना जानते हैं, और हर साल कॉमेडी फ़िल्में, सीरियल्स बहुत अच्छी कमाई कर के जाती हैं। हर कॉलेज, स्कूल में कल्चरल शो होते हैं जिसका एक बड़ा हिस्सा कॉमेडी का होता है। देश के ट्रेडिशनल आर्ट फ़ॉर्म को उठाइए, आपको सैकड़ों उदाहरण मिलेंगे जहाँ बहुरूपिए, विदूषक, जोकर स्टेज पर जाकर मनोरंजन करते हैं। कभी किसी को भी गाली देते नहीं सुना। हाँ एक समाज के तौर पर अगर गाली सुनकर, चाहे वो किसी को पड़ी हो, आप को हँसी आ रही है तो आपको मानसिक चिकित्सालय जाने की ज़रूरत है।

एक्सप्रेशन की दुहाई देने वाले तो टेररिज़्म, बलात्कार आदि को भी जस्टिफाय करने लगेंगे। कॉमेडी में मुँह से एक्सप्रेस करते हैं, और वहाँ कोई लगाम नहीं चाहते तो फिर बलात्कारियों, चोरों, और बम फोड़ने वाले आतंकियों के एक्सप्रेशन पर भी आपकी सहमति होगी?

आज एक स्टैंडअप कॉमेडियन ‘बूब्स’ की बात कर रहा है, कल को क्या पता वो कॉमिक एक्सप्रेशन के नाम पर पहली लाइन में बैठी किसी लड़की की छाती पर हाथ रख कर उसके वक्ष के आकार का मज़ाक़ उड़ाए। क्या पता किसी पारसी लड़की को स्टेज पर बुला कर उसे अपने साथ बच्चे पैदा करने कहे! कल को क्या पता किसी औरत को, जिसका चेहरा उसके हिसाब से भद्दा है, बुलाकर दो थप्पड़ मार कर ये कहे कि ‘इतनी बुरी हो मर क्यों नहीं जाती।’

“आप तो एक्सट्रीम में सोच रहे हैं, ऐसा थोड़े ही होता है!” मैं बिलकुल सही सोच रहा हूँ। इस तरह के एक्सप्रेशन का अगला क़दम यही होगा। फ़्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सिर्फ आपकी नहीं होती। और ना ही ये एब्सॉल्यूट है।

हुसैन के नंगी सरस्वती बनाने पर भी मुझे उतना ही ग़ुस्सा आता है जितना शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्ट के मोहम्मद, ईसा या गणेश के नंगे कार्टूनों पर या फिर इन बकचोदों के रोस्ट पर। लेकिन हाँ इसका मतलब ये नहीं कि कोई तन्मय भट्ट की टाँग तोड़ दे। टाँग मत तोड़िए, कार्टूनिस्टों को गोली मत मारिए। इसके लिए क़ानून बने हैं, मदद लीजिए। कुछ नहीं तो ऐसी सड़ी मानसिकता के एक्सप्रेशन का सामाजिक बहिष्कार कीजिए। आप देख रहे हैं तभी तो कोई बना रहा है।

ख़ैर पता तो तन्मय को भी होगा की उसने क्या किया है और क्यों किया है। इतना समझदार वो है कि एक विडियो के ज़रिए गुमनामी की गुफ़ा से बाहर कैसे आएँ। तन्मय और उसके जैसे लोग इसी तरह से चर्चा में आएँगे वरना उन्हें कुछ अच्छा करना पड़ेगा जिसमें शायद उन्हें थोड़ी क्रिएटिविटी, समय और टैलेंट की ज़रूरत होगी जो शायद अभी तक तो वो दिखा नहीं पाए हैं।

हाँ याद रहे कि बात लता या सचिन की नहीं है, बात दो लोगों की है और बात है कि क्या बातें कही गई हैं। मुद्दे से भटकिए मत।

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