इंटेलेक्चुअल लेजिटिमेसी की राह वन-वे होती है

ख़ुद के लिए इंटेलेक्चुअल लेजिटिमेसी पाने के लिए एंटी-मोदी होना ज़रूरी है। फिर हिंदू धर्म की आलोचना (और घृणा) और भी ज़रूरी है। ये दो बातें बहुत ज़्यादा प्रचलन में हैं। इस वन-वे पर आप निकल चुके हैं तो लौटने की कोशिश में आपके अपने ही आपको कुचलकर बढ़ जाएँगे।

अधकचरा ज्ञान लेकर, चाहे वो राजनीति हो, धर्म हो, धर्म के प्रतीक हों, या अर्थशास्त्र, हर बात को घृणा के लेप में लपेट कर उसे ‘कटाक्ष’ के रूप में प्रस्तुत करने से आपको आपके जैसे बुद्धिजीवियों के एक्सक्लूसिव ग्रुप में फ़ौरन सदस्यता मिल जाती है।

आप अंदर ही अंदर ख़ुश हो लेते हैं और आपके जैसे लोग भी ख़ुश हो लेते हैं। बहुत ही सहज तरीक़े से, आराम से आप ये मान लेते हैं कि बाकी लोग जो आप से सहमत नहीं हैं वो ‘भक्त’ हैं, चूतिये हैं। ये लिबरलों का सबसे लिबरल एटीट्यूड है। लिबरल की बात आप नहीं मानते तो आप इन्टोलरेन्ट हैं। ये लिबरल इतने लिबरल होते हैं कि बस यही सही बात करते हैं, बाकी तो इंटेलेक्चुअल हो ही नहीं सकते।

ये अपनी फ़र्ज़ी बुद्धिजीविता में इतने धँस चुके हैं कि मोदी की राजनीति और हिंदू धर्म के प्रति घृणा को खुलकर घृणा कहने में हिचकिचाते हैं। इससे इनको ये डर लगता है कि ये ‘ऑब्जेक्टिव’ नहीं रह जाएँगे। जबकि इन्हें अच्छे से पता है कि इनकी ये ‘आलोचना’ कितनी बायस्ड और मौक़ापरस्त है।

इनमें हिम्मत नहीं है ये कहने में इनको घृणा है। ना ही ये यह कह सकते हैं कि इन्हें अच्छा कौन लगता है। क्योंकि इनके नाजायज़ बापों की पूरी जमात हर रोज़ नंगी होती जा रही है। इनकी मौसमी ऑब्जेक्टिविटी याकूब, कन्हैया, अफ़ज़ल, अख़लाक़ पर खुलकर दिखती है। और यही ऑब्जेक्टिविटी विवेक अग्निहोत्री, प्रशांत पुजारी, डॉक्टर नारंग आदि के प्रकरण में ग़ायब हो जाती है।

मुझे अगर किसी से घृणा है, जैसे कि अरविंद केजरीवाल, तो मैं कहता हूँ कि मुझे है और क्यों है। मैं ये नहीं कहता की आलोचना कर रहा हूँ। मैं सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी की आलोचना नहीं करता। मुझे इन लोगों से घिन आती है और उसके लिए मेरे पास कारण हैं जो मैं लिखता हूँ।

लेकिन अगर ये अपने मन की बात कहने लगें तो इन बेचारों की इंटेलेक्टुअल सदस्यता खत्म हो जाएगी। ये चाहकर भी सरकार के लिए अच्छी बात नहीं कर सकते क्योंकि लेजिटिमेसी छिन जाएगी। इनको इनके अपने ही ‘भक्त’ कहने लगेंगे।

इनको काँग्रेस के चारण पत्रकारों की तरह, इनके मालिकों की शहंशाही छिन जाने के बाद, ऑब्जेक्टिविटी और ‘क्रिटिसिज्म’ के नाम पर हर डिप्लोमैटिक जीत के फ़ोटो का मज़ाक़, हर योजना की बुराई, हर हिंदू परंपरा के रिग्रेसिव होने के तर्क, हर सफलता का श्रेय ‘ये तो पिछली सरकार की योजना थी’ कहकर छीनने का कुतर्क, चलता रहेगा। चारण पत्रकारों की फ़ंडिंग बंद हो गई और इनकी लेजिटिमेसी चली जाएगी। और इनके पास जो है बस वही है।

ये वही हैं जो क्यूट हैं। इन्हें ‘चो च्वीट’ कहकर चुम्मा वाला इमोटिकॉन भेजिए कमेंट में। इनको ‘गेट वेल सून, क्यूटी पाय’ कहिए। ये बेचारे हैं जिनको ख़ुद का ही सामना करने में दिक़्क़त होती है, ये चाहकर भी बदल नहीं सकते। इनका वाह्यावरण इनके अंतर्मन पर हावी है। ये बेचारे दुःखी हैं, बहुत दुःखी। चुम्मा भेज दिया कीजिए इनको कमेंट में।

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