एक मुसलमान की बातों से दाढ़ी रखने वाले कुछ लोग नाराज़ हो गए हैं!

इरफ़ान ख़ान ने ईद के दिन बकरों की बलि और ‘क़ुर्बानी’ को लेकर एक जगह कुछ बोला। और वो बात बोली जो आप आमतौर पर किसी मुस्लिम के मुँह से, भले ही वो उसमें विश्वास करता हो, कभी नहीं सुनेंगे क्योंकि हिम्मत नहीं होती। इस्लाम पर कुछ भी बोलना सीधा ब्लासफेमी मान लिया जाता है मानो चौदह सौ साल पहले बनाए हर नियम वैसे ही आज भी लागू रहें।

नेपाल में भैंसों की बलि हो, भारत में हिन्दुओं द्वारा किसी भी रूप में जानवरों की बलि देनी हो, चीन में यूलीन फ़ेस्टिवल हो, पूरी दुनिया हैशटैग लेकर बैठ जाती है। यहाँ पर बलि को एक ग़ैरज़रूरी परंपरा मानकर लोग हैशटैग-हैशटैग इतना खेल देते हैं कि पूछिए मत।

यहाँ तो बीफ ईटिंग फ़ेस्टिवल तक मना दिए जाते हैं। ख़ैर वो अलग मसला है।

आज का मसला ये है कि इरफ़ान ने ईद के दिन क़ुर्बानी को लेकर बहुत अच्छी बात कही। या यूँ कहिए कि इस्लाम में क़ुर्बानी के क्या मायने हैं, उद्देश्य क्या है, इस पर कुछ कहा। उन्होंने कहा कि क़ुर्बानी तो उस चीज़ की दी जाती है जो आपको प्रिय हो। लेकिन लोग बाज़ार से बकरे ख़रीद कर ले आते हैं और काट कर खा जाते हैं, ये किस तरह की क़ुर्बानी है?

जैसा कि होना था कुछ लोगों को बिना बात का बुरा लग गया। ये बुरा उन्हीं को लगा होगा जो ना तो इस्लाम के बारे में जानते हैं, और ना ही ये सोचते हैं कि इस्लाम सफ़ेद टोपी लगा लेने से बहुत बड़ा है। यहाँ तो मुहम्मद के दाढ़ी थी, तो लोग सिर्फ दाढ़ी बढ़ाकर मुसलमान हुए जा रहे हैं!

बुरा सिर्फ उन्हें लगा है जो दाढ़ी बढ़ाकर इस्लाम के माई-बाप हो गए: इस्लामिक क्लेरिक! जी, इनके अनुसार इस्लाम पर बोलने का हक़ सबको नहीं है और इरफ़ान भाई ने ‘ग़ैर-इस्लामी’ बात कही है जो कि उनके ‘अधिकार क्षेत्र’ से बाहर है। एकदम यही बोला है दो दढ़ियल लोगों ने जिन्होंने जो बोला है उसके आधार पर मैं उन्हें मुसलमान तो क़तई नहीं मानता, मूर्ख ज़रूर मानता हूँ।

मतलब, तुमने ये दुकान चला रखी है? तुम बताओगे कि आम मुसलमान क्या बोलेगा, क्या पहनेगा? यही दिक़्क़त होती है जब सिर्फ दाढ़ी बढ़ा लेने से आदमी मुसलमान हो जाता है। जब पूरा आवरण ही सतही हो, तब उनसे गहराई की उम्मीद करना मूर्खता है।

ख़ैर मैं इन दाढ़ी बनाकर मुसलमान हो गए ज्ञानपुँजों की बात वैसे भी नहीं मानता। मुझे दुःख इस बात का हो रहा है कि बुद्धिजीवी लोग कहाँ हैं? वॉलीवुड वाले ही खड़े हो जाएँ और कहें कि इरफ़ान ने सच कहा है। कोई बुद्धिजीवी ये तो कह दे कि ये परंपरा रूढ़िवादिता है, रिग्रेसिव है। बिल्कुल वैसे ही जैसे शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर किया था।

मुझे बकरों के कटने से कोई हमदर्दी नहीं है। मैं तो जितना मिलता है उतना खाता हूँ। मुझे इस्लाम के इन दढ़ियल दुकानदारों से चिढ़ है जिन्होंने इस्लाम को समझने और समझाने का ठेका ले रखा है। ये दढ़ियल दुकानदार हर जगह हैं, शक्लें और भाषाएँ बदल जाती हैं। संस्कृत आती नहीं और सनातन धर्म की व्याख्या कर देंगे। होली वॉटर पिलाकर आँखों की रोशनी लाने वाले पादरी का तो आपको पता ही है, वैटिकन उन्हें बाक़ायदा ‘सेंट’ बना देता है।

आज कोई इरफ़ान की इस बात पर चर्चा भी नहीं करेगा। बकरे काट कर खाते रहो, इसको क़ुर्बानी तो मत ही कहो। क्योंकि मुझे भी वो कहानी पता है कि अल्लाह के सबसे करीब माने जाने वाले हज़रत इब्राहिम ने अपने बेटे को क़ुर्बानी के लिए सर काटने को तलवार उठाई थी तो क्या हुआ था। और ये भी पता है कि अल्लाह ने इब्राहिम से क्या माँगाथी। और ये भी पता है कि हज़रत इब्राहिम बाज़ार से ख़रीद कर एक जोड़ी बकरा नहीं ले गए थे।

सतह पर क्या है, ये देखकर मत चलो। इब्राहिम किसे लेकर अराफ़ात पर चढ़े थे, और आँखों पर पट्टी क्यों डाली थी, उसको जानो और जानने से ज्यादा समझो तो समझ जाओगे कि इरफ़ान जो कह रहा है वो सही कह रहा है।

Advertisements

Did you like the post, how about giving your views...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s