How I see Syrian refugee crisis and ISIS

As Syrian crisis is ‘allowed’ to worsen, the refugees will keep coming to the shores of developed economies facing recession and labour crises amid government regulations. These will be refugees and not citizens. Citizens need to be paid minimum wages.

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तन्मय, आइ एम अ फ़ैन एण्ड वान्ट टू फ़क यॉर… बट हे! ऑल इन गुड ह्यूमर

ये तो वही बात हो गई कि मैं तन्मय से हाथ मिलाकर ये कहूँ कि ‘मैं तुम्हारा बहुत बड़ा फ़ैन हूँ। और हाँ, तुम्हारे माँ की …!’ फिर हम दोनों ‘हें हें हें’ करते रहें और मैं ये कहूँ, “नाइस कॉमेडी ब्रो, बाइ द वे आइ वान्ट टू फक यॉर सिस्टर, ऑर मेबी नॉट। शी माइट बी एज़ अग्ली एज़ यू!’ ऑल इन गुड ह्यूमर, तन्मय!

तन्मय भाट की कॉमेडी का स्तर ‘घटिया’ होने पर ही खत्म हो जाता है

अगर मेरी सारी कॉमेडी पर्सनल अटैक करके, ‘कन्ट, डिक, फक, कॉक, पुस्सी’ कहकर हँसी ला रही हो तो मुझे अपना प्रोफ़ेशन बदल लेना चाहिए।

सरकारों का जश्नी विज्ञापण ब्लिट्ज़क्रेग कहाँ तक उचित है?

हर गाँव के सबसे ग़रीब घर की माँ को जब बिना कंकड़ के गेहूँ-चावल, हर महीने, उचित मात्रा में मिले, जिसे खाकर उसका बच्चा सरकारी स्कूल में एक अच्छी शिक्षा पाए और पास के अस्पताल में बुखार होने पर दवा पा ले, और ज़िंदा रहे, तब आपकी या कोई भी सरकार सफल मानी जाएगी।

बलात्कार पर राजनीति सिर्फ केजरीवाल कर सकते हैं, यही ‘नई राजनीति’ है

केजरीवाल जी की नई राजनीति अब इतनी ज़्यादा प्रेडिक्टेबल हो गई है कि अगर वो अपनी जगह एक ऑटोमेटेड कॉलर ट्यून भी लगा दें कि ‘हमारे पास तो पुलिस नहीं है’, ‘हमारे हाथ मोदी जी ने बाँध रखे हैं’, ‘ये तो एमसीडी का मसला है और वहाँ भाजपा के लोग हैं’, ‘ये फ़िल्म बहुत अच्छी है, ज़रूर देखिए’, तो भी दिल्ली वासियों का काम चल जाएगा।

एंटर-मार फेसबुकिया कविताओं को बढ़ावा देना बंद कीजिए

अगर आप इन घटिया कवियों को प्रोत्साहन देते रहेंगे तो हिंदी कविता का मतलब छोटी-बड़ी लाइनें हो जाएँगी जिसमें आपको चाँद, ओस की बूँद, बारिश, घास, आँखें, होंठ का हिलना आदि चालीस-पचास चिरपरिचित शब्दों के झुंड के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

असम में भाजपा की सरकार और बुद्धिजीवियों का कोरस में विधवा-विलाप

आपका ‘इंटेलेक्ट’ अब बस ‘मोलेस्ट’ होने के लिए ही बचा है। आपका सारा ज्ञान अब किसी तरह कुछ भी सरकार विरोधी बोलकर दाँत निपोड़ कर हँस लेना है। और अपने कन्विनिएंट समय तथा लॉजिक के अनुसार जादवपुर, एसएफआई के विद्यार्थी नेता द्वारा किए ख़ुलासे आदि को बिल्कुल भी ध्यान ना देकर कुछ और बात छेड़ देनी है।