सेकुलर राग: गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है!

बड़ी समस्या हो गई है। नहीं, लूज़ मोशन नहीं हुआ है। हाँ, कुछ सेकुलर लोगों को वर्बल डायरिया ज़रूर हो गया है। वैसे ये समस्या है नहीं। समस्या है कि कुछ लोग न सिर्फ पैदा हो गए हैं, बल्कि डार्विन के सर्वाइवल सिद्धांत को, फिटेस्ट ना होने के बावजूद, चुनौती देते हुए ज़िंदा बच गए… Continue reading सेकुलर राग: गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है!

गोमाँस ईटिंग फ़ेस्टीवल, बुद्धिजीविता, हिंदू-मुसलमान ब्ला, ब्ला, ब्ला

मैं क्या करता हूँ अजान सुनकर? एडजस्ट। क्यों? क्योंकि हिंदू धर्म सर्वसमावेशी है और बर्दाश्त करना सिखाता है। दूसरे धर्म और मत को जगह देना ही हिंदुत्व है। लेकिन आप ये सोच कर बैठ जाएँ कि आप जानबूझ कर किसी को उकसाएँगे और वो बर्दाश्त करता रहेगा तो ये आपकी भूल है।

मितरों, बीफ़ खाते रहिए और वंदे-मातरम् गाते रहिए

पूरा हाथ पाँव मारा जा रहा है कि दादरी काँड चलता रहे। इसके चलते रहने में बहुत फ़ायदा है कुछ लोगों को। अब ये नहीं चलेगा तो कैसे लोग ‘हम बीफ खा रहे हैं, हमें मारो’ का इंटेलेक्चुअलिज्म दिखा पाएँगे। दादरी काँड का ज़िंदा रहना आज़म खान जैसे मगजमारियों के लिए ज़रूरी है। ये खतम… Continue reading मितरों, बीफ़ खाते रहिए और वंदे-मातरम् गाते रहिए