नहीं बैसाखनंदन, मोदी की विदेश यात्राओं से ग़रीबी नहीं मिटी…

ना ही किसानों के घर में मरे बाप और भाई लौट कर आने लगे, ना ही दाल के भाव कम हो गए, ना ही सड़कों के गड्ढे भर गए, ना ही दंगे बंद हुए, ना ही निचली जातियों के दिन फिर गए…

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इंटेलेक्चुअल लेजिटिमेसी की राह वन-वे होती है

ये अपनी फ़र्ज़ी बुद्धिजीविता में इतने धँस चुके हैं कि मोदी की राजनीति और हिंदू धर्म के प्रति घृणा को खुलकर घृणा कहने में हिचकिचाते हैं। इससे इनको ये डर लगता है कि ये ‘ऑब्जेक्टिव’ नहीं रह जाएँगे। जबकि इन्हें अच्छे से पता है कि इनकी ये ‘आलोचना’ कितनी बायस्ड और मौक़ापरस्त है।

बंदर के हाथ नारियल, केजरीवाल के हाथ ट्विटर, एक ही बात है

अगर ऐसे ट्वीट से आम आदमी पार्टी के समर्थक निराश नहीं हैं तो उनको चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। अगर लगता है कि इसी तरह की राजनीति नई राजनीति है तो आईना देखना बंद कर दीजिए, क्योंकि आप अपनी सूरत बर्दाश्त नहीं कर पाओगे अगर थोड़ी भी समझ है।

दिल्ली देश नहीं है

पूरा टाईमलाईन आज नहीं पढ़ा दिन भर। कुछ लिखा भी नहीं, एक ने मेल करके झाड़ू पार्टी की जीत पर ‘शिगूफा’ छोड़ने कह दिया। भाजपा यहाँ हारी है या आआपा जीती है, या एक की जीत से दूसरी की हार हुई है, ये सब पॉलिटिकल एनालिस्ट लोग बता पाएँगे। हम कल भी भाजपा को वोट… Continue reading दिल्ली देश नहीं है

द इकॉनॉमिस्ट का कल्चर ज्ञान: आर्टिकल के रूप में अजेंडाबाजी

बुद्धिजीवी भारतवासियों की पुरानी आदत है कि वेस्टर्न मीडिया जो भी लिखे, भारत के हालात पर भी, हम एकदम जीभ लगा के चाट लेते हैं और गुनगाण करते रहते हैं। कुछ लोगों की आदत होती है वो आर्टिकल शेयर करने की ताकि लोगों को पता चले कि वो वॉशिंगटन टाईम्स और द इकॉनॉमिस्ट भी पढ़ते… Continue reading द इकॉनॉमिस्ट का कल्चर ज्ञान: आर्टिकल के रूप में अजेंडाबाजी