Kanhaiya Kumar: A disgusting face of neo-communists 

Kanhaiya is the disgusting face of neo-communists which revels in a high end restaurant, travels in air, uses the costliest smartphone, puts on a great leather jacket with his soles cushioned by some good quality sports shoes and then convincingly yells about poverty, ideology, literacy and what not.

भाषणों, प्रतिक्रियाओं और सुपरलेटिव विशेषणों के दौर में आलोचना का शीघ्रपतन

आजकल त्वरित प्रतिक्रियाओं का दौर चल रहा है जहाँ हर विशेषण सुपरलेटिव से कम नहीं होना चाहिए। आप या तो एकदम फ़ैन हो जाते हैं, या नकार देते हैं। दोनो ही स्थिति में आदमी अक्सर वजहें लिखना भूल जाता है।

कन्हैया जी, JNU देश नहीं है, न ही देश का प्रतिबिम्ब है

भारत के नए जवाहरलाल का स्वागत है। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जुमलों के खिलाफ बोलने के लिए  खुद जुमलों का सहारा ले रहे हैं। लेकिन ठीक है कि कम से कम इनकी आज़ादी अब भारत से नहीं, भारत में ही चाहिए। इनका कहना है की 31% ने ही इस सरकार को वोट दिया, बाकि… Continue reading कन्हैया जी, JNU देश नहीं है, न ही देश का प्रतिबिम्ब है

Do you see the irony, morons?

One day, one of my school friends from Indian Army visited us on his way home. It was after his first posting as an officer in Siachen. We were excited to hear his stories about the life at that altitude and that temperature. Spoiler alert, there is nothing romantic about the blinding white land with… Continue reading Do you see the irony, morons?

‘साइलेंस ऑफ़ द लेफ़्ट’, टाइप= कन्विनिएंट

सर? उ जेएनयू वाला काँड सुने क्या? अब कौन सा काँड हो गया बे? फिर कोई एमएमएस आया क्या? या फिर किसी ने सेक्सुअल ऑफेंस कर दिया? जेएनयू तो प्रोटेस्ट के साथ साथ भारत के तमाम विश्वविद्यालयों को ‘सेक्स, रेप और ‘फन टाइम” वाले आस्पेक्ट में पछाड़े हुए है। अरे नहीं सर, वो सब तो… Continue reading ‘साइलेंस ऑफ़ द लेफ़्ट’, टाइप= कन्विनिएंट